रविवार, 14 जून 2026

॥भक्ति महिमा॥

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सांई सतगुरु सेविये, भक्ति मुक्ति फल होइ ।*
*अमर अभय पद पाइये, काल न लागै कोइ ॥*
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राग बिभास ॥१६॥भक्ति महिमा॥ 
गाइये रामइयौ दातार । 
सब सुख आपै रोर कापै, निरधाराँ आधार ॥टेक॥
नारद सारद द्वारै गावैं, कीरति करैं कैंबार ।
नाथ अनाथ बन्धू, दालिद भंजनहार ॥
अखै अमरपद चारि पदारथ, देत न लावै बार ।
मैं आस करनैं गाइयौ, कवला नौं भरतार ॥
दूझै सदा भगति कै दोझै, खंडित नांहीं धार ।  
भगती भूरी दान आपै, मुकती पाडी लार ॥
पीलीपहु आराधियौ, म्हारा समर्थ सिरजनहार ।
बषनां दरबारि पहाऊ बोलै, बासन्यौं करतार ॥१४९॥

आपै = प्रदान करे । रोर = रौरव नरक तुल्य कष्ट तथा रौरव नरक के जनक पापों को कापै = काटता है । दूझै = दूध देता है, यहाँ द्रवित = प्रसन्न होता है । दोझै = दुहने की क्रिया । धार = दूध । भूरी = भैंस, यहाँ प्रभूत मात्रा में । पाडी = भैंस की बच्ची, यहाँ मुक्ति । पीलीपहु = रक्षक, आधार, अधिष्ठान । पहाऊ = प्रण, प्रतिज्ञा करने वाला; यहाँ परमात्मा शरणागतवत्सल है, वह अपने भक्तों की रक्षा करने की प्रतिज्ञा करता है, करने की प्रतिज्ञा के वचन बोलता है । बासन्यौ = बसने वाला । दातार रमैयाराम का सदा नामस्मरण करिये । वह समस्त सुखों = लौकिक-पारलौकिक दोनों को प्रदान करता है तथा रौरव समेत सभी नरकों के कष्टों तथा रौरवादि नरकों में जाने के हेतभूत समस्त पापों को जड़ सहित काट डालता है । वह अनाश्रितों का आश्रय देने वाला है ।
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नारद तथा शारदा उसके द्वार पर खड़े होकर उसके गुणों का गायन दिन में कई बार करते हैं । अर्थात् हमेशा करते ही रहते हैं । वह परमात्मा अनाथों का बन्धु तथा दारिद्र का भंजनहार है । अक्षय व अमर चौथे पुरुषार्थ मुक्ति को देने में वह तनिक भी विलम्ब नहीं करता है । ऐसे कमला के पति परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा को मैंने आशा करके ही गाया है कि वह अपने स्वभावानुसार मुझे भी अपनी अखय-अमर-भक्ति देकर मुक्ति प्रदान कर देगा । 
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वह परमात्मा सदा ही भक्ति रूपी साधा से ही प्रसन्न होता है । उसकी वह प्रसन्नता एकबार हो जाने के पश्चात् कभी भी किसी भी स्थिति में खण्डित नहीं होती । वह सदैव अखण्डित रूप में ही बनी रहती है । वह उच्च कोटि की भक्ति(प्रेमाभक्ति) प्रभूत मात्रा में प्रदान करता है और अंत में मुक्ति रूपी बोनस और देता है । मेरे समर्थ सृजनहार अधिष्ठानस्वरुप इष्ट की आराधना करने पर वह घट-घट में बसने वाला, परमात्मा के न्यायालय रूपी धर्मराज के दरबार में भक्त के पक्ष में ही बोलता है ॥१४९॥

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