रविवार, 28 जून 2026

परमात्म-तत्त्व


*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷 卐 सत्यराम सा 卐 🌷*
*शब्द सरोवर सुभर भर्‍या, हरि जल निर्मल नीर ।*
*दादू पीवै प्रीति सौं, तिन के अखिल शरीर ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 28.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 19.11.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 1 से 11 तक।
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*⚜️ परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति सुगम है, क्योंकि परमात्म-प्राप्तिके लिए ही मानव शरीर मिला है। जिसके लिए मनुष्य शरीर मिला है, उसीकी प्राप्ति कठिन होगी, तो फिर सुगम क्या होगा? मनुष्य शरीरका प्रयोजन तत्त्वकी प्राप्ति, मुक्ति, कल्याण, परम-लाभकी प्राप्ति, भगवान् में प्रियता, सर्वोपरि स्थितिकी प्राप्ति ही है। संसार नाशवान् है, परिवर्तनशील है— यह जानते हुए भी इसको सत् मानते हैं, यह बड़ी गलती है; यह अपने ही ज्ञानका अनादर है; अपनी जानकारीके निरादरका ही बन्धन है।*
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*⚜️ कौन नहीं जानता कि शरीर और शरीरसे संबंधित प्राणी-पदार्थ नाशवान् हैं, एक दिन अवश्य बिछुड़ेंगे; फिर भी हम इन्हें स्थाई रखना चाहते हैं, इनसे सुख लेते हैं, इनका आश्रय लेते हैं; फिर चाहते हैं कि हमारी पारमार्थिक उन्नति हो— ऐसी आशा रखना कहाँ तक ठीक है? नाशवान् में जो सत्य बुद्धि है, इसको दूर करनेकी सामर्थ्य मनुष्य मात्रमें है, इसमें कोई भी अयोग्य नहीं है, फिर भी इसे दूर नहीं करते— यह दूसरी गलती है। संसारके दूसरे काम होंगे या नहीं होंगे, उनमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। जिनमें सन्देह है, उनमें तो रात-दिन लगे हुए हैं और जो मौत निश्चित आनी है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते हैं।*
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*⚜️ सत्संगसे स्वभाव बदलता ही है। यदि ऐसा नहीं होता तो सत्संग करना, सद्विचार करना, अपनी उन्नतिके लिए विचार करना— सब निरर्थक हो जायेगा। सत्संग करने वालोंमें औरोंकी अपेक्षा विलक्षणता आती ही है, फिर भी हम अपना पूरा सुधार नहीं करते और थोड़ेमें सन्तोष कर लेते हैं— यह बड़ी बाधा है। मुक्त होने पर स्वभावमें ही फर्क पड़ता है; न तो जड़ शरीरमें फर्क पड़ता है, न चेतन आत्मामें ही फर्क पड़ता है, केवल मनुष्यका स्वभाव बदलता है।*
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*⚜️ गीताजीमें कामनाका त्याग और भगवान् को याद रखना— इन दो बातों पर बहुत जोर दिया गया है। नाम-जपकी महिमा सब मानते हैं, नाम-जपसे लाभ होता ही है। किसीके नाम-जप करनेकी जँच जाय, तो इसमें रत्तीभर भी पराधीनता नहीं है। मनमें कामना रहने पर ही वस्तुओंके नहीं मिलनेका दुःख होता है और कामनाका त्याग कर दें, तो वस्तु मिले, चाहे न मिले, दुःख होता ही नहीं। सेठजीने निष्कामता पर बड़ा जोर दिया है, सेठजीकी वाणीमें आता है कि— 'मुझे गीताजीसे और नाम जपसे जितना लाभ हुआ है, उतना लाभ किसी अन्य साधनसे नहीं हुआ है।'*
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*⚜️ वस्तुओंका मिलना या नहीं मिलना कामना करनेके अधीन नहीं है, अपितु एक अलग विधानके अन्तर्गत है, तो फिर कामना रखनेसे क्या लाभ? 'चाह गई चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिसके कछु नहिं चाहिए, सो शाहनपति शाह॥' परमात्म-तत्त्वके प्राप्तिकी इच्छा कामना नहीं है, यह जिज्ञासा, मुमुक्षा है, जो पूरी होती ही है।*

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