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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४४/४८
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निदिध्यास है ज्ञान पुनि, बडवा अनल समांन ।
माया जल भक्षन करै, सुन्दर यह हैरांन ॥४५॥
साधक के निदिध्यासन ज्ञान को समुद्र की वडवाग्नि के समान समझना चाहिये । जैसे बडवाग्नि समुद्र के जल का भक्षण करती रहती है; उसी प्रकार यह निदिध्यासन मायावरण को नष्ट करता रहता है । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं- साधारण जन के लिये यही हैरानी की बात है ॥४५॥
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आतम अनुभव ज्ञान है, प्रलय अग्नि की अंच ।
भस्म करै सब जारि कैं, सुन्दर द्वैत प्रपंच ॥४६॥
साधक का आत्मानुभवज्ञान प्रलयाग्नि के समान है । इस प्रलयाग्निरूप ज्ञान से साधक का समस्त आध्यात्मिक द्वैतप्रपञ्च विनष्ट होता रहता है ॥४६॥ (४३ से ४६ साषी तक द्र० - सवैया : २८/२९) ।
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नित्य कहत गुरु आतमा, सो है शब्द प्रमांन ।
जैसैं ब्यापक ब्यौम पुनि, सुन्दर यह उपमांन ॥४७॥
प्रत्यक्ष आदि चार प्रमाणों से आत्मा में नित्यत्वसिद्धि : हमारे गुरुदेव शब्द(श्रुति) प्रमाण से आत्मा को शुद्ध, बन्धरहित, नित्य एवं त्रिकालाबाधित सत्य बताते हैं । तथा आकाश की व्यापकता, अखण्डता एवं परिपूर्णता के उपमान(सादृश्य) के सहारे से आत्मा को भी ऐसा ही मानते हैं ॥४७॥
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जाकी सत्ता इन्द्रियनि, यह कहिये अनुमांन ।
सुन्दर अनुभव आतमा, यह प्रत्यक्ष प्रमांनं ॥४८॥
"यह चेतन है, क्योंकि सभी इन्द्रियाँ उसी से चैतन्य प्राप्त कर स्वस्व व्यापार करती है"- यह अनुमान प्रमाण भी आत्मा की नित्यता ही सिद्ध करता है । तथा अनुभवज्ञान से आत्मा का साक्षात्कार कर लिये जाने पर उस का प्रत्यक्ष ज्ञान भी आत्मा की नित्यता में प्रबल प्रमाण है ॥४८॥ (द्र० - सवैया छः २८/२७) ॥
(क्रमशः)

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