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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग २५/२८
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रवि ससि तारा दीप पुनि, हीरा होइ अनूप ।
सुन्दर उनकै तेज तैं, दीसै उनकौ रूप ॥२५॥
सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, दीपक या अनुपम हीरा आदि मणिरत्न अपने ही तेज से अपना रूप प्रकट करते हैं ॥२५॥
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त्यौं आतम के तेज तें, आतम करै प्रकास ।
सुन्दर इन्द्रिय जड सबै, कोइ न जाणैं तास ॥२६॥
इसी प्रकार, आत्मा के तेज(प्रकाश) से उस आत्मा का ज्ञान(दर्शन) होता है; क्योंकि हमारी सभी इन्द्रियाँ जड हैं; वे किसी चेतन का ज्ञान, किसी चेतन का आश्रय लिये विना कैसे कर सकती हैं, प्रकाशित करना तो बहुत दूर की बात है ! ॥२६॥
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कोई थापत कर्म कौं, कोई थापत काल ।
को कहै सृष्टि सुभाव तैं, सुन्दर बाइक जाल ॥२७॥
सृष्टि के विषय में विभिन्न दार्शनिकों के मत : कोई दार्शनिक (कर्मवादी) कर्म को ही इस सृष्टि का रचयिता मानते हैं । उन के मत में जो जैसे कर्म करता है उसकी वैसी ही उत्पत्ति होती है । आत्मा से इस सृष्टि का कोई सम्बन्ध नहीं है ।
कोई कालवादी दार्शनिक काल से ही सृष्टि रचना मानते हैं ।
तथा कोई(स्वभाववादी) दार्शनिक स्वभाव से ही इस समस्त सृष्टि की उत्पत्ति मानता है । जिसका जैसा स्वभाव होता है वैसी ही योनिपरम्परा में उस की उत्पत्ति होती है - ऐसा उन का मानना है ॥२७॥
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कौ कहै माया ब्रह्म पुनि, दोऊ सदा अनादि ।
जैसैं छाया ब्रक्ष की, सुन्दर यौं प्रतिपादि ॥२८॥
कोई(द्वैतवादी) दार्शनिक माया एवं ब्रह्म - इन दोनों से समस्त सृष्टि रचना होती है । तथा वे इन दोनों(माया एवं ब्रह्म) को अनादि मानते हैं । कोई प्रतिबिम्बवादी दार्शनिक कहते हैं कि माया ब्रह्म की छायामात्र है, अतः ब्रह्म यदि अनादि है तो माया भी अनादि ही है । उनसे यह सृष्टि रची गयी है ॥२८॥
(क्रमशः)

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