मंगलवार, 23 जून 2026

राग-सरोवर ॥

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सहज सरोवर आतमा, हंसा करै कलोल ।*
*सुख सागर सूभर भर्‍या, मुक्ताहल मन मोल ॥*
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*राग-सरोवर ॥*
तिहि तीरथ मेरा मन न्हावै, जिहि तीरथ का थाघ न आवै ॥टेक॥
सो बाहरि न भीतरि नेड़ा न दूरि, सो जल आवै सहज हलूरि ।
मुक्ता झूलि रह्या सर पूरि, तिहि सरि न्हावैं पंचौं दूरि ॥
अठसठि तीरथ तिन थैं भला, तिस तीरथ मेरा मन चला ।
तिनकै न्हायैं निर्मल होइ, अैसा तीरथ और न कोइ ॥
सुखसागर तीरथ का नाऊँ, तिहँ सागर मैं डूभी खाऊँ ।
आठ पहर ताही मैं रहूँ, अैसा तीरथ और न कहूँ ॥
अबरण बरण बहुत बिस्तार, ताका सूझै बार न पार ।
राम कलस ता मांहैं भरै, तहाँ बषनां साँपडि सेवा करै ॥१५७॥
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तीर्थस्थ जिस सागर = सरोवर की थाघ = गहराई का पता नहीं चलता उस तीर्थ में मेरा मन स्नान करता है । वह सरोवर न बाहर है न भीतर है न दूर है और न पास ही है । वह सर्वत्र समान रूप में एक जैसा परिव्याप्त है । उसमें जल सहज रूप में कल्लोल करता हुआ = उछल-कूद करता हुआ आता है ।
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उस भरपूर सरोवर में अनेकों मुक्ता-मोती = मुक्त संत-महात्मा स्नान करते हैं । उसी सरोवर में मैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधात्मक पांचों विषयों को त्याग कर नहाता हूँ । भूमिस्थ अड़सठ तीर्थों से यह सर्वथा उत्तम है । इस उत्तम तीर्थ में स्नानार्थ ही मेरा मन चल दिया है । जिस तीर्थ में नहाने से मन निर्मल हो जाता है, ऐसा तीर्थ इसके अतिरिक्त और कोई नहीं है । इस तीर्थ का नाम सुखसागर है और मैं इसमें डुबकी पर डुबकी लगाता हूँ ।
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आठोंपहर = चौबीसों घंटे मैं उसी में रहता हूँ । इस जैसा कहीं भी और दूसरा कोई तीर्थ नहीं है । वर्णन से परे अवर्णनीय बहुत विस्तार वाला है यह सरोवर । इसका आर-पार सूझता नहीं है, ज्ञात नहीं होता है । बषनां ऐसे ही राम-सरोवर में से रामनाम रूपी कलश को भरकर उसके जल से साँपडि = स्नान करता है और परमात्मा की अहर्निश स्मरण रूपी सेवा करता है ॥१५७॥

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