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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२७. अक्षर बिचार कौ अंग ९/१२
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जैसैं बिंजन मिलत है, पर अक्षर सौं जाइ ।
अहंकार सुन्दर गयें, आतम ब्रह्म समाइ ॥९॥
जैसे स्वररहित कोई भी व्यञ्जन आगे वाले व्यञ्जन वर्ण से जा मिलता है; वैसे ही प्राणी की अहन्त्व ममत्व भावना मिटने से उस का आत्मा ब्रह्म में लीन हो जाता है ॥९॥ (तु० - निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति - भ० गी० २/७१) ॥
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बिंजन पर अक्षर मिलै, द्वैत भाव दरसाइ ।
भक्त मिलै भगवंत कौं, सुन्दरदास कहाइ ॥१०॥
भक्त की अपेक्षा ज्ञानी का वैशिष्ट्य : जैसे किसी स्वररहित(क् आदि) व्यञ्जन के पर व्यञ्जन में मिल जाने पर भी उन दोनों में द्वैतभाव दिखायी देता है; इसी प्रकार भक्त का भगवान् से मिलन होने पर भी वह उसका दास 'सुन्दर का दास' ही कहलाता है; क्योंकि उनमें द्वैत भाव है ॥१०॥
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बिंजन पर अक्षर मिलै, द्वैत भाव नहिं कोइ ।
सुन्दर ज्ञानी ब्रह्ममय, एक मेक मिल होइ ॥११॥
परन्तु जैसे किसी स्वररहित व्यञ्जन के आगे वाले स्वर में मिल जाने पर उन दोनों का द्वैत भाव मिट जाता है, वे एकमेक(एकरस) हो जाते हैं; उसी प्रकार, ज्ञानी भी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाने पर वह उसमें तन्मय हो जाता है ॥११॥
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बिंजन स्वर अक्षर मिलै, होइ और ही रूप ।
रज बीरज संयोग तें, उपजै देह स्वरूप ॥१२॥
दो स्वरों के मिलन की एक अन्य विशेषता : जैसे 'अ' स्वर में 'इ' स्वर मिल जाने पर उनकी एक व्यञ्जनरहित अन्य विशिष्ट आकृति(ए) बन जाती है; उसी प्रकार स्त्री एवं पुरुष के रज एवं वीर्य के संयोग से एक विशिष्ट आकृति(मानव शरीर) बन जाती है ॥१२॥
(क्रमशः)

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