मंगलवार, 16 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५/८*
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*रज्जब भजन भण्डार में, दीरघ दौलत१ दोय ।*
*इहां सुखी संसार मधि, आगे आनँद होय ॥५॥*
भजन रूप भण्डार में दो प्रकार का महान धन१ है एक तो वैराग्य और दूसरा आत्मज्ञान । वैराग्य से व्यक्ति राग रहित व्यवहार करता है, अत:वह संसार में सुखी रहता है और आत्मज्ञान से आगे आनन्द स्वरूप हो जाता है । भजन करने से वैराग्य और ज्ञान स्थिर रहते हैं ।
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*रैणाइर१ रंकार२ मधि, मुकता३ रिधि सिधि माँहिं ।*
*जन रज्जब मथ जापकर, रत्नहुं टोटा नाँहिं ॥६॥*
समुद्र१ में रत्न रूप धन बहुत था, देव दानवों ने मन्थन करके निकाला, वैसे ही हे साधक ! राम के बीज मंत्र "राँ"२ में ऋद्धि सिद्धि रूप धन बहुत३ है, जाप रूप मन्थन कर, फिर तेरे पास भी कमी नहीं रहेगी ।
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*साहिब के घर सौंज१ बहु, सुमिरन सम कोइ नाँहिं ।*
*रज्जब भज भगवंत ह्वै, सकल बोल ता माँहिं ॥७॥*
ईश्वर के घर में नाना प्रकार की सामग्री१ है किन्तु स्मरण के समान कोई भी नहीं है । भजन करने से प्राणी भगवान् बन जाता है, संपूर्ण शास्त्र तथा सभी संतों का वचन उसे भगवत् स्मरण में लगाने की ही प्रेरणा करते हैं ।
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*रज्जब बंदा बंदगी, कियों सरे सब काज ।*
*सेवक सेवा कर लहै, श्री सहित शिर-ताज ॥८॥*
भक्त जब भक्ति करता है तब ही उसके विक्षेप निवृत्तिपूर्वक सभी कार्य सिद्ध होते हैं । इस कारण सेवक सेवा करके माया और माया पति परमात्मा को भी प्राप्त करता है ।
(क्रमशः)

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