सोमवार, 15 जून 2026

२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२७. अक्षर बिचार कौ अंग १७/२०  
.
आपुन लघु ह्वै जात है, और हि दे सनमांन । 
सुन्दर रीति बडेन की, जानहिं संत सुजांन ॥१७॥ 
लोक में भी हम देखते हैं कि भले लोगों की यह परिपाटी(परम्परागत स्वभाव) है कि वे स्वयं साधारण(सत्सङ्गति एवं गुरुभक्ति से संयुक्त = लघु) होते हुए भी दूसरे(अपने अनुगामियों) का सम्मान ही करते हैं । यह बात सभी सज्जन जानते हैं ॥१७॥
.
जो कोउ आइ बडौ कहै, धरैं बडाइ सीस । 
तौ हू आप समा करै, सुन्दर बिस्वा बीस ॥१८॥ 
ऐसे सज्जनों का यह स्वभाव ही होता है कि उनके पास आकर उन से बड़ा कोई कुछ कहता है तो वे उस के महत्त्व(बडप्पन) को ध्यान में रखते हुए, स्वयं समता रखकर उन को पूर्णतः(बीस विस्वा) सन्तुष्ट करते हैं ॥१८॥
.
सुन्दर लघुता गहि रहै, दूरि करैं जब गर्ब ।
गुरु ताही कौं देत है, बित्त आपनौ सर्ब ॥१९॥ 
जो शिष्य गुरु के सम्मुख अपना सब सांसारिक अभिमान त्याग कर लघुता(नम्रता) ग्रहण किये रहता है, गुरुदेव प्रसन्न होकर ऐसे गुणी शिष्य को ही अमूल्य ब्रह्मज्ञानोपदेश प्रदान करते हैं ॥१९॥
.
जौ गुरु कै पीछे रहै, तौ लघु दीरघ होइ । 
आगै लघु कौ लघु रहै, सुन्दर पुस्तक जोइ ॥२०॥
इति अक्षर बिचार को अंग ॥२७॥
छन्दःशास्त्र के अनुसार जैसे जो लघु वर्ण गुरु वर्ण का अनुगमन करता है वह समय पा कर स्वयं गुरुत्व धारण कर लेता है । गुरु वर्ण से आगे रहने वाला लघु वर्ण सदा लघु ही रह जाता है; इसी प्रकार गुरुदेव का अनुगमन करने वाला शिष्य कभी न कभी समय पाकर (साधना पूर्ण होने पर) स्वयं गुरु हो जाता है; परन्तु जो शिष्य होकर भी गुरु से अभिमान करता है वह सदा लघु(साधनाहीन) ही रह जाता है । उसकी साधना कभी सफल नहीं हो सकती । उस का तत्त्वज्ञानी(ब्रह्मसाक्षात्कार) होना तो असम्भव हो समझिये ॥२०॥
इति अक्षरविचार का अंग सम्पन ॥२७॥
(क्रमशः) 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें