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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*नूर तेज ज्यों जोति है, प्राण पिंड यो होइ ।*
*दृष्टि मुष्टि आवै नहीं, साहिब के वश सोइ ॥*
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जगत ॥
ब्रिक्ख बध्या जड़ जाइ न जाणी । है कोइ रोपणहार बिनाणी ॥टेक॥
ऊग्या जहाँ तहाँ जड़ नाहिं । कूँपल मेल्ही कूँपल नाहिं ।
तरवर है पर मूल न डार । फूल नहीं फल अनत अपार ॥
जाइ तहाँ तहाँ कोइ न जाणैं । है कोइ फेरि अपूठा आणैं ।
जड़ जाणैं सोइ सेवग तेरा । बषनां बोलै वो गुर मेरा ॥
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“ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वस्थं प्राहुरव्ययम् ।
छंदासि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१॥
अधश्चोर्ध्वंप्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषय प्रवालाः ॥
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबंधीनि मनुष्यलोके ॥१५|१-२॥
इन दो श्लोकों के भावों पर रचा गया जान पड़ता है । संसार रूपी वृक्ष बहुत विशाल रूप में बढ़ गया है किन्तु परमात्मा रूपी जड़ को पूर्णरूप में जानना मुश्किल है ।
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इसको उगाने वाला कोई न कोई बिनाणी = विज्ञानी = विशिष्ट ज्ञानयुक्त पुरुष है । जिस जगह पर यह उगा हुआ है, वहाँ इसकी जड़ नहीं है । इसमें कोपलें उगाई हैं किन्तु कोपलें हैं नहीं । यह वृक्ष रूप वृक्ष है किन्तु न इसकी जड़ है और इसमें डाले ही है । इसमें फूल का नामनिशान तक नहीं है किन्तु फल अनंत संख्या में हैं ।
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जहाँ पर यह जाता है, वहाँ इसको कोई नहीं जानता किन्तु क्या कोई ऐसा है जो इस जाते हुए को वापिस ले आये । (विनाश होते हुए संसार को विनष्ट होने से बचा ले क्योंकि ‘संसरिती-संसारः’ जो प्रतिक्षण क्षरित होता है, वह संसार है) जो इस संसार रूपी वृक्ष की परमात्मा रूपी जड़ को जानता है, हे परमात्मा वही तेरा सच्चा सेवक है । बषनां कहता है, मेरा वही सच्चा गुरु भी है ॥१५६॥

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