रविवार, 21 जून 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*



*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*

*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*

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*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*

*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*

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*२०. सुमिरण का अंग ~२९/३२*

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*नाम अनेकों एक है, तो भज राम रहीम ।

*ज्यों ज्यों सुमिरै सांइयाँ, जन रज्जब सु फहीम१ ॥२९॥*

एक ईश्वर के नाम अनेक हैं, तब नामों में भेद बुद्धि न रख कर दयालु राम के कोई भी नाम का स्मरण करना चाहिये । ज्यों ज्यों स्मरण बढ़ता जायगा त्यों त्यों ही समझदार१ होता जायगा और प्रतिष्ठित हो जायगा ।

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*नाम अनन्त अनन्त के, सो सब एक समानि ।*

*रज्जब जाणे सो सुमिर, मन वच कर्म उर आनि ॥३०॥*

अनन्त स्वरूप परमात्मा के नाम भी अनन्त है और निष्काम भाव से स्मरण करने से सभी ब्रह्म प्राप्ति रूप समान फल देते हैं, अत: मन, वचन, कर्म से हृदय में नाम का स्मरण करके उस पर ब्रह्म के स्वरूप को जानने का यत्न करो ।

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*नाम अनेकों एक गुण, ज्यों बहु बूंद हुँ वारि१ ।*

*जन रज्जब जान रु कही, नर निरखहु सु निहारि॥३१॥*

जैसे बहुत जल बिन्दुओं में एक जल१ होता है, वैसे ही ईश्वर के नाम अनेक हैं किन्तु उनमें स्मरण करने पर इच्छा पूर्ति करना रूप गुण एक ही है । यह बात हमने अच्छी प्रकार जानके कही है, हे साधक नर ! तू भी ध्यानपूर्वक देख ।

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*ज्यों आतम अरवाह इक, त्यों ही राम रहीम ।*

*उदक आब कछु द्वै नहीं, रज्जब समझ फहीम१ ॥३२॥*

जैसे उदक और आब दोनों जल के ही नाम है, आत्मा और अरवाह दोनों आत्मा के ही नाम है । वैसे ही राम और रहीम दोनों ईश्वर के ही नाम हैं । ज्ञानीजनों१ की यही समझ है ।

(क्रमशः)

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