शनिवार, 27 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४१/४४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४१/४४
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अनुभव बिन जानै नहीं, सुन्दर ब्यापक रूप । 
बाहिर भीतर एकरस, ऐसा तत्व अनूप ॥४१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - उस ईश्वर का वास्तविक रूप एवं वास अनुभवज्ञान के विना नहीं जाना जा सकता । वह तो बाह्य एवं आभ्यन्तर दशा में समान तथा अनुपम रूप वाला है ॥४१॥
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पंच कोस तें भिन्न है, सुन्दर तुरिय स्थांन । 
तुरियातीत हि अनुभवै, तहां न ज्ञान अज्ञांन ॥४२॥
शरीरस्थ १. अन्नमय कोष, २. प्राणमय कोष, ३. मनोमय कोष, ४. विज्ञानमय कोष एवं ५. आनन्दमय कोष - इन पाँच कोषों के त्यागने पर ही षष्ठ तुर्य(जीव) स्थान प्राप्त किया जा सकता है । इस अनुभवज्ञान की अवस्था तुर्यातीत कहलाती है । वह अवस्था ज्ञान एवं अज्ञान - दोनों को अतिक्रान्त कर चुकी होती है ॥४२॥ (द्र० - सवैया : २८/२८) ।
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श्रवन ज्ञान है तब लगै, शब्द सुनै चित लाइ । 
सुंदर माया जल परै, पावक ज्यौं बुझि जाइ ॥४३॥
ज्ञानचतुष्टय की अग्निचतुष्टय से तुलना : अब श्रीसुन्दरदासजी चतुर्विध ज्ञान की वास्तविकता बताते हुए कहते हैं - श्रवणज्ञान को उस अग्नि के समान समझना चाहिये जो जल डालते ही बुझ जाती है; क्योंकि साधक के चित्त पर माया का आवरण होते ही उस का श्रवणज्ञान भी तत्काल विलुप्त हो जाता है ॥४३॥
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मनन ज्ञान नहिं जात है, ज्यौं बिजुरी उद्दोत । 
माया जल बरखत रहै, सुन्दर चमका होत ॥४४॥
साधक का मननज्ञान मेघों में चमकने वाली उस बिजली के समान है जो जलमय मेघों का सम्पर्क होने पर भी बुझती नहीं है । इसी प्रकार यह मनन ज्ञान, चित्त के मायावृत्त होने पर भी, लुप्त नहीं होता ॥४४॥
(क्रमशः)

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