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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*पीवै पिलावै राम रस, माता है हुसियार ।*
*दादू रस पीवै घणां, औरों को उपकार ॥*
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साधु ॥
भाव भजन की भाठी आगे, राम रसाइण पीवन लागे ॥टेक॥
देहरी कलाली तूं जिनि नाटै, हरि रस तौ है तन कै साटै ।
एक पियाला हमकौं दीया, साथी सह मतिवाला कीया ॥
सद मति वाले साध हमारे, तन मन कापड़ गहणें मारे ।
सार सुधा रस हिरदै धारैं, हरि रस पिवैं पिचकारी डारें ॥
पीवैं सदा खुमार न भागै, ल्यावही ल्याव सदा ल्यौ लागै ।
नाचें गावैं हरि रस राते, बषनां दादूपंथी माते ॥१४८॥
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मानस में कहा है ‘तन बिनु बेद भजन नहि बरना’ बिना शरीर के परमात्मा का भजन कर पाना संभव नहीं है । यहाँ देह से तात्पर्य मात्र मनुष्य देह से है क्योंकि इसके अतिरिक्त अन्य सभी शरीर भोग शरीर हैं । उनमें नये कर्म रूपी भजन भाव करने संभव नहीं है । इसीलिये सभी ग्रंथों में कहा गया है, “एहि तन करि फल विषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥’’ अतः मनुष्य जन्म पाकर रामरस सुधा का पान करना चाहिये, विषयविष का परित्याग करना चाहिये ।
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संत-महात्मा भाव = श्रद्धा तथा भजन की भट्टी पर तैयार हुए रामरसायन रूपी मद को पीने में लगे रहते हैं । वे कहते हैं, हे देह रूपी कलाली ! तू इस मद को पीने-पिलाने के लिये निषेध मत कर क्योंकि हरि रस तो तबही तक पिया जा सकता है जब तक शरीर विद्यमान है । साधु-संत रूपी गुरुमहाराज ने एक प्याला पीने को मुझ बषनां को भी दिया जिसने मुझे तो मतवाला बनाया ही, मेरे साथियों को भी राम-रसायन में सरावोर कर दिया ।
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मेरे संगी-साथी साधु सदमति = सत् स्वरुप परमात्मा का भजन-ध्यान करने वाले हैं । उन्होंने तन और मन के कापड़ = पड़दों को उतार दूसरों को दे दिये हैं । अर्थात् तन और मन दोनों को सर्वथा निर्विषय करके उनमें रामजी को बसा लिया है । वे सारस्वरूप सुधारस को ही हृदय में धारण करते हैं । वे स्वयं उस हरिरस को पीते हैं तथा उपदेश रूपी पिचकारियों में भर-भरकर अन्यों को पिलाते हैं ।
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वे उस हरिरस को दिन-दो दिन अथवा ऋतु विशेष में नहीं पीकर सदैव पीते हैं जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं है । वे सदैव कलाली रूपी सुरति से राम-नाम-स्मरण रूपी रसायन और लाकर कर पिला, और लाकर पिला ही कहते रहते हैं । अर्थात् उनका राम-नाम-स्मरण के प्रति प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता ही है ‘प्रतिक्षणवर्धमानं ।’ हरिरस में निमग्न हुए वे कभी नाचते हैं और कभी भगवन्नाम का गायन करते हैं ।
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मैं दादूपंथी बषनां भी उसी रामरसायन में निमग्न हूँ ॥१४८॥ यहाँ एक बात लक्ष्य करने की है कि दादूजी के अनुयायी प्रारंभ से ही ‘दादूपंथी’ कहलाते हैं न कि संत श्रीसुंदरदास द्वारा बताये गये ‘ब्रह्म संप्रदायी’ । इसीलिए सुंदरदासजी के मत को पंथ में मान्यता नहीं मिल सकी ।

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