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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू बहुरूपी मन जब लगै, तब लग माया रंग ।*
*जब मन लागा राम सौं, तब दादू एकै अंग ॥*
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भजन-उपदेश ॥
भजि रे मन हरिचरण ।
स्वामि असरण सरण, पतित पावन जाकौ बिड़द छाजे ।
करम कानैं करण, दुख दालिद्र हरण, बिना गोबिन्द क्यूँ भीड़ भाजै ॥टेक॥
जेथि जीव ऊबरै, काज कोई सरै, सो नहीं कोइ आपणौं लोक माँही ।
जीव कौ सगौ संसार मैं सोधियौ, बिना गोविन्द कोइ और नांहीं ॥
तैं करम जेता किया, नहीं छूटै हिया, जीव जो लै पड्यौ असति भाखै ।
तीनि लोक मैं कहूँ ठाहर नहीं, राम बिना दूसरी कौंण राखै ॥
जो विरद मोटौ बहै, पार को न लहै, तास की साषि सुणि साध भणैं ।
बात बषनां बणैं समझि घरि आपणैं, चालि मनवालि मन तास सरणैं ॥१६२॥
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हे मन ! परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा के चरणों का भजन-स्मरण कर । उस हरि, का अशरणों को शरण देने वाला और पतितों को पावन करने वाला बिड़द है । वह कर्मों के बंधनों को काटने वाला तथा दारिद्य का हरण करने वाला भी कहा जाता है ।
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ऐसे गोविन्द के भजन-स्मरण किये बिना कष्ट कैसे समाप्त हो सकते हैं ! जिसकी रंचमात्र कृपा से जीवों का उद्धार हो जाता है, असंभव से असंभव कार्य भी पूरा हो जाता है, ऐसे के अतिरिक्त संसार में अपना और कोई नहीं है । संसार में जीव का हितैषी खूब ढूंढा किन्तु गोविन्द के अलावा अकारणहितैषी और कोई नहीं है ।
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हे मन ! तूने जितने भी कर्म किये हैं वे यों ही कटने वाले नहीं है क्योंकि जीव उन कर्मों के फेर में पड़कर सदैव असत्य भाषण करता रहता है । उन कर्मों के इतने भयंकर परिणाम हैं कि तीनों लोकों में कहीं भी जीव को रुकने = ठहरने के लिये स्थान नहीं है ।
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अतः ऐसी स्थिति में रामजी के बिना और ऐसा दूसरा कौन है जो घोर पापी जीव को अपने यहाँ रहने को स्थान देवे । वस्तुतः रामजी मोटौ = महान प्रण का निर्वाह करता है । उसके प्रण की कोई थाह नहीं पा सकता है । उसके द्वारा पूर्वकाल में किये गये भक्तों के प्रति अप्रतिम उपकारों की साक्षियाँ उसके भक्त-संत-महात्मा कहते हैं ।
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अतः बषनां समझता है, कहता है, अपने घर में ही = समय रहते ही सारी बातें समझ ले । पराये घर में = यमराज के यहाँ समझने से कुछ लाभ नहीं होगा क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी । अतः हे मनवालि = संसारासक्त मन ! उस परब्रह्म-परमात्मा की शरण में चल जिसका ऊपर वर्णन किया गया है ॥१६२॥

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