🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२८. आत्म अनुभव कौ अंग १३/१६
.
जाकै अनुभव होत है, ताही कै सुख चैन ।
सुन्दर मुदित रहै सदा, पूछै बोलै बैन ॥१३॥
हम वास्तविक आत्मानन्दानुभवी उसी साधक को कह सकते हैं जिस के हृदय में आत्मज्ञान प्रस्फुटित हो चुका हो । ऐसा साधक उस आनन्द से सदा प्रमुदित रहता है । तथा अधिकारी जिज्ञासु को उस आत्मज्ञान का कुछ उपदेश भी करता है ॥१३॥
.
सुन्दर डुबकी मारि कै, सुख मैं रहै समाइ ।
वह सब कौं देखत फिरै, वह नहिं देख्यौ जाइ ॥१४॥
सच्चा साधक इस ज्ञानसागर में गहरा गोता (डुबकी) लगाकार उसी ज्ञानानन्द के अनुभव में ही निमग्न रहता है; क्योंकि व्यवहार में वह सब की यथार्थता जान चुका है, जबकि उसकी यथार्थता कोई भी नहीं जान पाया ॥१४॥
.
अनुभव करिकै आतमा, जानैं ज्यौं आकास ।
सदा अखंडित एकरस, सुन्दर स्वयं प्रकास ॥१५॥
परिमाणरहित आत्मा : क्योंकि वह आत्मज्ञान द्वारा यह जान चुका है कि उसका ही आत्मा, आकाश के समान, सर्वत्र व्यापक है । वह आत्मा अखण्ड एवं सदा एक ही स्थिति में रहने वाला और स्वयम्प्रकाश (स्वसंवेद्य) है ॥१५॥
.
ताकौ आदि न अंत है, मध्य कह्यौ नहिं जाइ ।
सुन्दर ऐसौ आतमा, सब मैं रह्यौ समाइ ॥१६॥
आकाश के समान, इस आत्मा का भी न आदि है, न अन्त और न मध्य ही है । अतः इन विशेषताओं वाला यह आत्मा ही सर्वत्र व्यापक है ॥१६॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें