शुक्रवार, 5 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग ३३/३६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ३३/३६ 
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प्रान वोर जो देखिये, सबकौ एकै प्रान । 
सुन्दर क्षुधा तृषा लगै, सबकौं एक समान ॥३३॥
यदि प्राण पर विचार किया जाय तो यह भी सब प्राणियों का समान ही प्रतीत होता है; क्योंकि सभी प्राणियों को भूख प्यास आदि कष्टीं का समान रूप से अनुभव होता है ॥३३॥
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मनहूं कौ जो देखिये, मन सबहिन कौ एक । 
सुन्दर करै बिकल्पना, अरु संकल्प अनेक ॥३४॥
यदि इन के मन के विषय में विचार किया जाय तो यह मन भी सभी प्राणियों का समान ही प्रतीत होता है; क्योंकि सभी प्राणियों का मन विविध सङ्कल्प विकल्प ही करता रहता है ॥३४॥
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सुन्दर एकै आतमा, जब यह करै बिचार । 
तब कछु भ्रम दीसै नहीं, एक रहै निरधार ॥३५॥
अब प्राणियों की आत्मा के विषय में विचार किया जाय तो उसमें कहीं कोई भ्रम नहीं दिखायी देता; क्योंकि वह तो निश्चित रूप से सब प्राणियों का एक ही है ॥३५॥
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कै दुख पावै देह यह, कै इन्द्रिनि दुख होइ । 
सुन्दर कै दुख प्रान कौ, यह संमुझावौ कोइ ॥३६॥
प्रश्न : हे गुरुदेव ! संसार को दुःखमय कहा जाता है, तो यह दुःख प्राणी का शरीर अनुभव करता है ? या इस की इन्द्रियाँ ? या इस के प्राणों को यह दुःख होता है ? - यह मुझे स्पष्टतः समझावें ॥३६॥
(क्रमशः) 

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