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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २५/२८
जन्म मरण बहु भांति के, आगै जम की त्रास ।
चौरासी के दुःख सुंनि, सुंदर भयौ उदास ॥२५॥
और यह भी बताया कि इस संसार में जन्म-मरण की परम्परा बहुत लम्बी है । इस में किये गये हीन(पाप) कर्मों के कारण यमराज के यहाँ जाकर कठोर दण्ड भी भोगना पड़ता है । तथा इसी कारण प्राणी को चौरासी लाख योनियों में घूमते रहना पड़ता है । यह सुनकर वह जिज्ञासु उदास(निराश) हो गया ॥२५॥
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बादल गये बिलाइ कैं, तारनि कैं उजियार ।
देख्यौ रजु कौं सर्प तब, सुन्दर बिना बिचार ॥२६॥
परन्तु गुरुपदेश के पुण्य प्रभाव से उस विषयासक्त जिज्ञासु के पापकर्म विलीन हो गये तथा उस के अल्प पुण्यों के प्रभाव से उस के हृदय में तारागण के समान सात्त्विक मध्यम प्रकाश हो गया । उस समय उसने संसार के विषय में सामान्य चिन्तन किया तो उसे रज्जु में सर्प की भ्रान्त प्रतीति होने लगी ॥२६॥
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सुंदर कियौ बिचार जब, प्रगट भयौ तब भान ।
अंधकार रजनी गई, सर्प मिट्यौ रजु जान ॥२७॥
जब गुरुकृपा से उस मुमुक्षु ने इस संसार पर पुनः विवेकपूर्वक चिन्तन किया तब उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश आविर्भूत हुआ । उस की पापमय अन्धकार से आवृत रात्रि समाप्त हो गयी । उसकी भी ज्ञान के प्रकाश में सर्प की भ्रान्ति नष्ट हो गयी तथा रज्जु की वास्तविकता स्पष्ट दिखायी देने लगी ॥२७॥(१)
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सूतौ जीव नरेस यह, सुख सज्जा परि आइ ।
बडी अबिद्या नींद मैं, सुंदर अति सुख पाइ ॥२८॥
भ्रान्तिविषयक दूसरा उदाहरण : कोई जीव रूपी राजा, कभी अज्ञाननिद्रा के वश होकर, सुखशय्या पर सो गया ॥२८॥
(क्रमशः)

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