शुक्रवार, 19 जून 2026

२८. आत्म अनुभव कौ अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ९/१२
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सौ जानै जाकै भयौ, आतम अनुभव ज्ञान । 
मुख सौं कहें बनै नहीं, सुन्दर जानै जान ॥९॥
अतः इस अनुभवज्ञान की वास्तविकता(यथार्थता) वही ज्ञानी जान सकता है जिस को ऐसे साक्षात्कार का अनुभव हुआ हो । पुनरपि इस का मुख से वर्णन होना असम्भव ही है ॥९॥ 
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सुन्दर जिनि अमृत पियौ, सोई जानै स्वाद । 
बिन पीये करतौ फिरै, जहां तहां बकवाद ॥१०॥
अमृत का यथार्थ स्वाद(माधुर्य) वही जान सकता है जिसने कभी वह अमृत पीया हो । अवशिष्ट लोग तो सुनी सुनायी बात को ही जहाँ तहाँ सुना कर केवल प्रलाप(=बकवाद) ही करते हैं ॥१०॥

सुन्दर जाकै बित्त है, सो वह राखै गोइ ।
कौडी फिरै उछालतौ, जो टटपुंज्यौ होइ ॥११॥ 
ऐसी गोपनीयता में एक उदाहरण : लौकिक धन सम्पत्ति की महत्ता वही समझ सकता है, जिस के पास उस का असीम कोष(खजाना) हो । वह टटपूंजिया(= दरिद्र, निर्धन) उस का महत्त्व क्या समझेगा जिसके पास अपनी दैनिक जीवनयात्रा चलाने के लिये भी सम्पत्ति सुलभ न हो, भले ही वह अपने पास के स्वल्प धन(कौड़ी) का कितना भी बखान क्यों न करे ! ॥११॥
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जाकै घट अनुभव नहीं, ताकै सुख नहिं लेश । 
सुन्दर बहु बकवाद करि, करतौ फिरै क्लेश ॥१२॥
जिस साधक के हृदय में आत्मज्ञान का कुछ भी अंश न हो, उस को वह सुख कैसे और कहाँ मिलेगा ! भले ही वह लोक में अपने आत्मज्ञानी होने का कितना ही ढिंढोरा(ढोल) पीटता रहे ॥१२॥
(क्रमशः) 

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