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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग २९/३२
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नास्ति बादी यौं कहै, कर्त्ता नाहीं कोइ ।
सुन्दर मिल्या संजोग सब, पुनि बियोग हू होइ ॥२९॥
कोई नास्तिक(चार्वाकमतानुयायी) कहता है - इस सृष्टि का कर्ता कोई नहीं है; अपितु जब जैसा तत्त्वों का संयोग मिलता है वैसी ही सृष्टि हो जाती है और वियोग होने पर उस सृष्टि का नाश हो जाता है ॥२९॥
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षट दरसन सब अंध मिलि, हस्ती देख्या जाइ ।
अंग जिसा जिनि कर गह्या, तैसा कह्या बनाइ ॥३०॥
ये छह दार्शनिक अन्धगजन्याय१ से अपने अपने मत पर आरूढ रहते हुए सृष्टि के विषय में ही स्व स्व मत का प्रतिपादन करते हैं ॥३०॥ (१ शास्त्रों में इस अन्धगजन्याय का वर्णन है - कुछ अन्धों ने हाथी के विभिन्न अङ्गों का पृथक् पृथक् स्पर्श किया । किसी ने कान का स्पर्श किया तो उसने हाथी को सूप के समान बताया । किसी ने शिर का स्पर्श किया तो वह हाथी को घट के समान बताने लगा । इस प्रकार उन अन्धों ने हाथी के अंगों का पृथक् पृथक् स्पर्श किया और तदनुसार वे उसे पृथक् पृथक् नाम से ख्यापित करने लगे । इस न्याय का वर्णन सर्वप्रथम बौद्ध ग्रन्थों में हुआ है । इसके लिये बौद्धों का उदान पालि ग्रन्थ(पृ० १२४) द्रष्टव्य है । (बौद्धभारती ग्रन्थमाला, वाराणसी से प्रकाशित) ॥
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झगरन लागे परस्पर, काकी मानै कौंन ।
सुन्दर देख्या दृष्टि सौं, तिनि तौ पकरी मौंन ॥३१॥
वे अपने मत पर दृढता से स्थिर रहते हुए परस्पर कलह करते हैं । वहाँ कौन किस की बात मानता है ! परन्तु जिन ज्ञानियों ने शुद्ध ज्ञान से तत्त्व का साक्षात्कार कर लिया वे इन के मतों की उपेक्षा करते हुए मौन ही है ॥३१॥ (३०-३१ साषी के विस्तार के लिये द्र० - सवैया, अंग २८ का छन्द : १७)
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बांधि गरगदा सब चलै, करी मुक्ति कौं दौर ।
सुन्दर धोखा मैं परे, मुक्ति कहौ किहिं ठौर ॥३२॥
कुछ अन्ध अज्ञानी पूरी तत्परता(गरगदा) के साथ मुक्ति प्राप्ति की लालसा से साधना में लगे । परन्तु उन को अपने असत्य मतवाद के कारण, अन्त में धोखा(भ्रम) ही हुआ । उस साधना से उनकी भवमुक्ति कैसे हो पाती ॥३२॥
(क्रमशः)

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