बुधवार, 24 जून 2026

साहिब सुलतान तूँ ही

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*खसम हमारा सिरजनहारा, साहिब समर्थ सांई ।*
*मीरां मेरा मेहर मया कर, दादू तुम ही तांई ॥*
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रागकाफी ॥१८॥विनती॥
साहिब सुलतान तूँ ही, मैं गुलाम तेरा ।
धणी तू धणियाप कीजै, मिहरवान मेरा ॥टेक॥
आदि अंति तूँ ही जाणैं, खानाजाद तुम्हारा ॥
लालबुबा लौंडी का जाया, हरि बोला हुसियारा ।
सादिया बै लबै मीराँ, अैसी भाँति कमाऊँ ।
तुम्हारे दरबार बिना, दूरि रह्याँ दुख पाऊँ ॥
बंदे की अरदासि याहीं, साहिब सुणि लीजै ॥
बषनौं बकसीस पावै, पाऊँ लागण दीजै ॥१५८॥
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सुलतान = स्वामी । धणियाप = स्वामीपना । मिहरवान = दयालु । खानाजाद = सेवक । लालबुबा = वेश्याओं से व्यवहार रखने वाला अर्थात् नीच कर्मरत । लौंडी = वेश्या । सादिया = सीधा-सपाट, निष्कपट । लबै = होठों पर । मीराँ = परमात्मा । अरदासि = प्रार्थना । बकसीस = आशीर्वाद कृपा ॥
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हे परमात्मन् ! तू मेरा मालिक और मैं तेरा गुलाम हूँ । तू मेरा दयालु मालिक है । अतः अपनी दया मेरे ऊपर कर । मैं तेरा खानदानी गुलामी हूँ । अतः तू मेरे आदि अंत अर्थात् बाहर-भीतर आगे-पीछे की सब बातों को जानता है ।
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मैं नीचकर्मरत वैश्या (माया को संतों ने वेश्या ही कहा है क्योंकि यह किसी एक को स्वामी बनाकर स्थाईरूप से उसके घर में नहीं रहती । जने-जने के यहाँ फिरती-फिरती है । शरीर मायाजन्य है । अतः शरीरेण बषनां वेश्या का पुत्र तथा वेश्यागामी है । वास्तविकता में नहीं, आत्मरूपेण भी नहीं) का पुत्र हूँ ।
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राम-राम बोलकर बड़ा हुआ हूँ । अर्थात् बड़ी कठिनाई से तेरे भक्ति-भजन के रास्ते पर आया हूँ । निष्कपटभावयुक्त मेरे होठों पर सदैव परमात्मा का नाम हो; बस, इसी रूप में मैं सदैव कमाता = साधना करता रहूँ ।
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हे परमात्मन् ! बिना तेरी शरण के अन्यत्र मैं दुख ही दुख पाता हूँ । मुझ सेवक की यही प्रार्थना है कि मैं सदैव आपके चरणकमलों का चंचरीक बना उन्हीं पर मंडराता रहूँ । आपकी अहेतुकीकृपा पाने का पात्र बना रहूँ । कृपा प्राप्त कर सकूँ । हे स्वामी ! मेरी इस प्रार्थना को सुण लीजिये = स्वीकार का लीजिये ॥१५८॥

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