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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*भौ सागर में डूबतां, सतगुरु काढे आय ।*
*दादू खेवट गुरु मिल्या, लीये नाव चढाय ॥*
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विनती ॥
भौ जल क्यूँ तिरौं रे, म्हारौ पाण न पूजै कोइ ।
एकहि खेवट नाव बिन, डाभकडूभा होइ ॥टेक॥
अति औंडौ आसँध नहीं, कीजै कौंन उपाइ ।
पारि परोहन नीसरै, जे हरिजी होइ सहाइ ॥
पाँच कुसंगी सँगि रहै, भूंडा भौंडै होइ ।
जे हौं तिरिबा की करौं, तौ आघौ देहि धकाइ ॥
पाण नहीं पाणी नहीं, भेले पड़ी न बाथ ।
जे तूँ तारै तौ तिरौं, हरिजी पाकड़ि हाथ ॥
भौ सागर मैं डूबताँ, अबकै लेहु उबारि ।
बषनां दे रे बूंबड़ी, साहिब कै दरबारि ॥१६०॥
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पाण = शक्ति, सामर्थ्य । पूजै = प्रभावशाली । डाभकडूभा = कभी डूबना कभी पानी के ऊपर आना । आसंघ = शक्ति, बल । परोहन = नौका । भूंडा-भौंड़ै =बुरे-बुरे होकर । पाणी = प्राणी = साथी । भेले = साथ में । बाथ = पतवार । बूंबड़ी = जोर से चिल्लाकर अर्थात् अतीव दीन होकर प्रार्थना ॥
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मेरी स्वयं की शक्ति इतनी प्रभावी नहीं है कि मैं भवजल से पार हो सकूँ । अतः मैं बार-बार विचारता और कहता हूँ कि मैं भवजल से कैसे तिर सकता हूँ । मेरे पास एक हरि क आश्रय रूप केवट का बल नहीं है । इसीलिये डाभकडूभा हो रही है । भवसागर अत्यन्त गहरा है । मेर स्वयं की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि मैं इसे पार कर जाऊँ ।
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बताइये ! अब इसको पार करने का क्या उपाय है । मेरी नौका तबही पार निकल सकती है, जब परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा मेरे सहायक बन कर मेरी सहायता करें । बुरे स्वाभाव वाले बुरा करने के लिये सदैव ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधात्मक पंचविषय मेरे साथ रहते हैं जो जब भी मैं भवसागर को तैरने का प्रयत्न करता हूँ तब ही वे और गहरे जल में धक्का दे देते हैं । मेरे में बल का सर्वथा अभाव है ।
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मेरे रामजी के अतिरिक्त और कोई सहायक प्राणधारी नहीं है । मेरे पास भक्ति रूपी पतवार भी नहीं है । अतः हे हरिजी ! यदि तू ही मेरा हाथ पकड़ कर मुझे तारेगा तो मैं तिरुंगा । अन्यथा नहीं तिर पाऊंगा । हे हरि ! भवसागर में मुझ डूबते हुए को अबकी बार अवश्य पार कर देना ।
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बषनांजी अपने मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, हे मन ! परमात्मा के दरबार में विनीत भावापन्न होकर गंभीर एवं करुण-प्रार्थना कर कि अबकी बार मुझ डूबत हुए को पार कर दे ॥१६०॥

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