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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग ३७/४०
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दूरि करै सब बासना, आशा रहै न कोइ ।
सुन्दर वह ई मुक्ति है, जीवत ही सुख होइ ॥३७॥
इस भवमुक्ति का वास्तविक उपाय यही है कि साधक को अपने मन की सभी सांसारिक वासनाएँ दूर करते हुए समस्त तृष्णाओं का भी त्याग कर देना चाहिये । यही मुक्ति है । इसी से साधक को जीवन में स्थायी सुख मिल सकता है ॥३७॥ (३२ से ३७ साषी के विस्तार के लिये द्र० - सवैया, इसी अंग का छन्द १३-१४)
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सुन्दर कोऊ कहत हैं, नाभि कंवल मैं ईस ।
कोऊ ऐसैं कहत हैं, हृदय माहिं जगदीस ॥३८॥
कोई मतवादी(हठयोगी) नाभिकमल में उस ईश्वर का निवास(आश्रयस्थल) बताता है । कोई उस जगत्स्वामी का आवास हृदय कमल में बताता है (भ० गीता, अ० १८/६१) ॥३८॥
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कोऊ कंठ बिषै कहैं, अग्र नासिका कोइ ।
कोऊ भृकुटी मैं कहैं, सुन्दर अचिरज होइ ॥३९॥
किसी योगी ने ईश्वर का वास कण्ठ में बताया है । किसी ने इस का स्थान नासिका के अग्रभाग पर बताया है । तथा कोई भृकुटी(चक्षुओं के मध्य भाग) में ईश्वर का स्थान बताता है - यह सब सुन सुन कर हमें आश्चर्य होता है ॥३९॥
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कोऊ कहैं लिलाट मैं, कोऊ तालु मांहिं ।
कोऊ भौंर गुफा कहैं, सुन्दर अनुभव नांहिं ॥४०॥
कोई इस का वास ललाट(मस्तक) में मानता है तो कोई तालु में मानता है । कोई(मेरुदण्ड के सम्मुख, ग्रीवा के उपरि भाग में विद्यमान) भ्रमरगुफा को ईश्वर का वास मानता है; परन्तु हमारा अनुभव ज्ञान इन सब मतों के विरुद्ध है ॥४८॥ (३८ से ४० साषी के लिये द्र० - सवैया : अंग २८/१६)
(क्रमशः)

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