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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १७/२०
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नां वह सूक्षम स्थूल है, नां वह एक न दोइ ।
सुन्दर ऐसौ आत्मा, अनुभव ही गमि होइ ॥१७॥
वह आत्मा न सूक्ष्म है, न स्थूल; न वह एक है, न अनेक । ऐसी विशेषताओं वाला वह आत्मा एकमात्र स्वकीय अनुभव से ही जानने योग्य हो सकता है ॥१७॥
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नां वह रूप अरूप है, नां वह मूल न डाल ।
सुन्दर ऐसौ आतमा, नां वह बृद्ध न बाल ॥१८॥
उस आत्मा को न रूपवान् कह सकते हैं, न नीरूप(रूपरहित); न उसे मूल(जड) कह पाते हैं, न शाखा; न उस पर किसी वृद्धावस्था या युवावस्था का प्रभाव न बाल्यावस्था का ही । यह आत्मा ऐसी ही विशेषताओं वाला है ॥१८॥
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लघु दीरघ दीसै नहीं, नां वह भीत अभीत ।
सुन्दर ऐसौ आतमा, कहिये बचनातीत ॥१९॥
न उस आत्मा को लघु(छोटा) कह सकते हैं, न दीर्घ(बड़ा) ही । न वह किसी से भीत(डरा हुआ) है, न निर्भय(भयरहित) । अतः ऐसी विशेषताओं वाले आत्मा को हम वाणी से अवर्णनीय(वचनातीत = अनिर्वचनीय) ही कह सकते हैं ॥१९॥
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इन्द्रिय पहुंचि सकै नहीं, मन हू की गमि नांहिं ।
सुन्दर जानै आयु कौं, आपु आपु ही मांहिं ॥२०॥
क्योंकि उसकी वास्तविकता जानने में न किसी की इन्द्रियाँ ही समर्थ हैं, न किसी का मन ही समर्थ हो सकता है । वह तो स्वयं ही तन्मय होने पर स्व(अपने) को जान सकता है ॥२०॥
(क्रमशः)

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