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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*आगो पीछो परिमित नांहिं,*
*केते पारिख आवहिं जाहिं ॥*
*आदि अन्त मधि कहै न कोइ,*
*दादू देखै अचरज होइ ॥*
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*आत्मा-परमात्मा ॥*
हंसा एक काया मैं रहै, ताका बरण न कोई लहै ॥टेक॥
हर्या न नीला स्याम न सेत । गुर गमि बिना न पावै भेद ॥
जब यहु हंसा उडि करि जाइ । बहुरि न सरवरि बैठे आइ ॥
कितेक ग्याता किताक ग्यान । न जाणैं वाका उनमान ॥
एक अचंभा आवै मोहिं । है तौ सही लहै नहिं कोइ ॥
अैसा कोई साध न चौर । अैसी प्यारी बस्त न और ॥
जब लग घट मैं बाकी लोइ ॥ तब लग घर मैं आनन्द होइ ॥
ना सो हलका न सो भार । धनि हो धंनि उपावनहार ॥
जिनि अैसी कल मेल्ही लाइ । जब बषनां ताके गुण गाइ ॥१५५॥
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“न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंग शस्त्रेण दृढेन छित्वा ॥”१५|३॥
यद्यपि इस श्लोक में संसार रूपी वृक्ष का वर्णन है जबकि बषनांजी के पद में अरूपा, अवर्णा, अनामा, अशरीरी परमात्मा का वर्णन है तथापि संसार का नाशवान होने के कारण एकरूपा न होना तथा परमात्मा का अरूप होने से रूपहीन होना एक जैसा ही है । “रूप न रंग रेख नहिं जाकै, है तैसा ही देख ॥”
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शरीर में एक हंस रूपी आत्मा रहता है उसका वर्ण कोई नहीं जानता है । वह न हरा है, न नीला है, न काला है और न सफेद है । उसका रहस्य गुरुज्ञान के बिना जानना असंभव है । एकबार जब यह आत्मा शरीर में से निकलकर चली जाती है तब पुनः उसी शरीर में आकर निवास नहीं करती है । कितने ही वेदशास्त्रों के ज्ञाता और कितने ही ज्ञान की चर्चा करने वाले ज्ञानी इस आत्मा का सही उनमान=अनुमान भेद नहीं जान पाते हैं ।
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बषनांजी कहते हैं, मुझे एक बात आश्चर्यजनक लगती है कि आत्मा वास्तव में है काल्पनिक नहीं है फिर भी इसका वास्तविक बोध किसी को भी नहीं हो पाता है । चौर प्रियवस्तु को चुरा लेता है किन्तु इस आत्मा जैसी प्रियवस्तु को चौर भी नहीं चुरा पाता । कोई साधु भी ऐसा नहीं है जो इसको चुराकर अपने पास रख सका हो । जब-तक इस आत्मा का प्रकाश = सत्ता (लोइ) शरीर में रहता है तब-तक हृदय में आनंद होता है, शरीर में हलचल तथा आत्मानंद अनुभव होता है । यह आत्म तत्व न हल्का है और न भारी ही है । इसके उपजाने वाले को अनेकों धन्यवाद है ।
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वास्तव में आत्मा न उत्पन्न होती है और न मरती ही है~
“न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥”२|२०॥
बस, अपने अंशी से मिलती बिछुड़ती है । बषनांजी ने इस मिलने-बिछुड़ने को उपजना कहा है । जिस परमात्मा ने ऐसी अद्भुत कल = यंत्र = वस्तु बनाई है(आत्मा जैसी) उसके बषनां गुणों को गाता है ॥१५५॥

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