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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१५. विरक्त् का अंग ~३७/४०*
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*पंच विषय पंचौ रहत१, मन से मनोरथ त्याग ।*
*रज्जब लायक राम की, यहु उत्तम वैराग ॥३७॥*
पंच ज्ञानेन्द्रिय आसक्ति पूर्वक पांचों विषयों में जाने से रह१ जाय और मन से मनोरथ रूप विषयों का त्याग हो जाय, तब समझना चाहिये कि अब बुद्धि ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हुई है और इस अवस्था को ही उत्तम वैराग कहते हैं ।
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*मनसा पंच भरतार तज, जे वैरागिनि होय ।*
*रज्जब पावे परम घर, जहाँ न सुख दुख दोय ॥३८॥*
यदि बुद्धि पंच विषय रूप पंच भरतारों को त्याग करके विरक्त हो जाय, तो जहाँ विषयजन्य सुख और दुख दोनों ही नहीं है, उस पर ब्रह्म रूप श्रेष्ठ घर को प्राप्त कर लेती है ।
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*जन रज्जब तन सौ तरक१, मन की माने नाँहिं ।*
*सो विरक्त ब्रह्मांड में, बैठा निज मत२ माँहिं ॥३९॥*
जिसने शरीर का राग त्याग१ दिया है, मन की अनुचित बात भी नहीं मानता है जो अपने सिद्धान्त२ में अडिग स्थिर रहता है, ब्रह्मांड में वही विरक्त कहलाता है ।
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*माया मोह मदन मन मारे, काया कसणी दण्ड ।*
*सो रज्जब विरकत सही, घर ही में वन खण्ड ॥४०॥*
जो आत्मज्ञान द्वारा मायिक मोह को और वस्तु विचार द्वारा काम को नष्ट करता है तथा शरीर को साधन- कष्ट रूप दण्ड देता है, वही सच्चा विरक्त है, उसके लिये घर में ही वन निवास की-सी स्थिति बन जाती है ।
(क्रमशः)

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