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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कह्या हमारा मान मन, पापी परिहर काम ।*
*विषयों का संग छाड़ दे, दादू कह रे राम ॥*
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मन ॥
पकड़ि पकड़ि मन कौं बैठाइ ।
इहि बिधि हरि कैं सुमरणि लाइ ॥टेक॥
मन दौड़ै देही बैसाणी । आसण इसा न होइ रे प्राणी ॥
मन फोरा देही पांगुली । भौ सागर तिरिबा की रली ॥
जौ लग मन बैसै नहिं ठाइ । तौ लग तिल भरि तिर्या न जाइ ॥
मन जाते का करौ गयेसा । बषनां सतगुर कह्यौ संदेसा ॥१५२॥
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मन चंचल है । एक आलम्बन पर टिकता नहीं है । पकड़कर लाओ, फिर भाग जाता है । भागते रहना ही इसकी नियति है । इस पर बषनांजी कहते हैं, साधक का कर्तव्य है, वह भागते हुए चलायमान मन को पकड़-पकड़ कर जाने से रोककर एक लक्ष्य में स्थिर करने का प्रयत्न करे ।
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इसप्रकार से इस चंचल मन को रामस्मरण में संलग्न करे । मन दौड़ता है । देह एक जगह स्थिर रहती है । हे प्राणी ! इस प्रकार से आसन सिद्ध नहीं होता है, रामजी का भजन नहीं होता है । मन विषयविकारों से विनिर्मुक्त होकर हल्का हो जाये तथा शरीर विषयों को भोगे नहीं = पांगुला हो जाये । वास्तव में भव रूपी सागर से पार होने का तरीका यही है ।
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जब तक मन परमात्मा रूपी एकस्थान = लक्ष्य में स्थिर नहीं होता तब तक संसार-सागर की पूरी दूरी में से एक तिलभर की दूरी तक भी पार हुआ नहीं जा सकत । जाते हुए मन को गयेसा = ग्रहण करो = रोको, बषनां कहता है, सद्गुरु महाराज का सर्वप्रथम संदेश = उपदेश यही है ॥१५२॥

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