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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*.
*२०. सुमिरण का अंग ~१३/१६*
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*षट् दर्शन नाम हि कहैं, नाम हि वेद पुरान ।*
*तो रज्जब नाम हि गहो, पाया भेद विनान१ ॥१३॥*
षड् दर्शन(६ शास्त्र) वा नाथ, जंगम, सेवड़े, बौद्ध, सन्यासी, शेष, ये ६ के नाम स्मरण की प्रेरणा करते हैं और वेद पुराणादि सदग्रंथ भी नामस्मरण साधन को श्रेष्ठ कहकर उसके करने की प्रेरणा करते हैं । उक्त शास्त्रादि तथा सद्गुरु के उपदेश से हमने नाम स्मरण विषयक रहस्यमय विज्ञान१ प्राप्त कर लिया है । अत: साधक को नाम-स्मरण साधन ही करना चाहिये ।
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*सब ही वेद विलोय कर, अंत दृढावें नाम ।*
*तो रज्जब जगदीश भज, इतना ही है काम ॥१४॥*
सम्पूर्ण वेदों का मनन करके विद्वान् संत नामस्मरण रूप साधन ही दृढ़ता से करने की प्रेरणा करते हैं । तब जगदीश्वर का ही भजन करना चाहिये, साधक को अपने कल्याण के लिये नाम स्मरण रूप कार्य ही बहुत है ।
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*साधू वेद बोल हि सु यूं, राम कहे सब कीन ।*
*जन रज्जब जग उद्धरहिं, जो जीव जगपति लीन ॥१५॥*
संत तथा वेद ऐसा ही कहते हैं कि - जिसने राम का स्मरण कर लिया, उसने सब कुछ कर लिया । जो जीव जगतपति परमेश्वर के स्मरण में लीन होते हैं, वे जगत से पार हो जाते हैं ।
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*रज्जब पैठे राम में, सो रट द्वारे होय ।*
*मिलबे को मारग यही, और न दूजा कोय ॥१६॥*
जो भी राम के स्वरूप रूप धाम में प्रवेश करते हैं, वे राम स्मरण रूप द्वार से ही करते हैं, राम से मिलने का मार्ग यही है अन्य कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

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