शुक्रवार, 12 जून 2026

आनंद बधावौ बाजै

🪷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🪷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सतगुरु अलख अलाह का, कहु कैसा है नूर ।*
*दादू बेहद हद नहीं, सकल रह्या भरपूर ॥*
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राग ललित ॥१४॥परिचय॥
आनंद बधावौ बाजै आतम केवल राम बिराजै । 
अगरि चंदनि आंगनौं लिपाऊँ, मुतियन चौक पुराऊँ ॥टेक॥
प्रेम कलस सर ऊपरि धारौं, हरि आयाँ सामाहीं पधारौं । 
पाँच सहेली मंगल गावो, तन मन वारि वारि दरसन पावो ॥
गोवल गुड़ी भयौ उछाह, नारी नेह घरि आयौ नाह ।  
आजि म्हारै बस्ती आज म्हारै बासा, कहै बषनौं हरि पुरवी आसा ॥१४६॥ 
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आत्मा में निष्केवल रामजी विराजमान हो जाए अर्थात् दोनों का एकाकार हो जाए, एतदर्थ आनन्ददायक बधावे = मंगल गीत गाता हूँ । अगर और चंदन से मैं अपना आंगन लीपता हूँ तथा मोतियों से चौक पूरता हूँ । प्रेम रूपी कलश मस्तक पर धारण करता हूँ तथा परात्पर-परब्रह्म हरि के आने पर उसका स्वागत करने को उसके सन्मुख जाता हूँ । 
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हे मेरी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों रूपी सहेलियों ! मंगल गीतों का उच्चारण करो और उस प्रियतम रूप रामजी पर तन-मन न्यौछावर करके उसका दर्शन करो । गोवल = वियोग, गुडी = समाप्त हो गया । पत्नी रूपी साधक के घर में पति रूपी परमात्मा आ गया है । परिणामतः हृदय में अत्यन्त उछाह = आनन्द छा गया है । 
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प्रियतम के आ जाने से आज मेरे घर में बस्ती  = चहलपहल हो गई । (बस्ती = जनसमुदाय । जन समुदाय के आ जाने पर चहल पहल ही होती है, सूनापन मिट जाता है ।) वह मेरे घर में ही निवास कर रहा है । बषनां कहता है, परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा ने मेरे हृदय रूपी घर में पधार कर मेरी मनोभिलाषा पूर्ण की है ॥१४६॥

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