मंगलवार, 2 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग २१/२४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग २१/२४ 
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भोपा भोपी आइ कै, बहुत लगायौ दोष । 
सुन्दर या ऊपर कियौ, देवी देवन रोष ॥२१॥
अविवेकी ओझा(मन्त्रवैद्य) : तब किसी ओझा(भोपा) को या उसकी स्त्री को, वहाँ उस रोगी की चिकित्सा के लिये, बुलाया जाय । वह, आते ही, उस पर किसी देवी या देवता का कोप बताकर उस पर नाना प्रकार के दोष लगावे ॥२१॥
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अपनी अपनी सब कहै, अटकर परै न कोइ । 
सुन्दर बहुत मता सुने, कछू बिचार न होइ ॥२२॥
ये सभी तथाकथित(अविवेकी) ज्ञाता, अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार, रोग निवृत्ति के अनेक उपाय बताते हैं; परन्तु उनकी कोई भी युक्ति(अटकल) या उपाय सफल नहीं होते । इस प्रकार, हमने अनेक विद्वानों के अभिमत सुने । किन्तु चिन्तन करने पर इनमें कोई भी मत विचारसरणि पर नहीं चढ सका ॥२२॥
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जे बिषई अत्यंत करि, रहै बिषै फल खाइ । 
सुन्दर मावस की निसा, अभ्र रहे अति छाइ ॥२३॥
भ्रान्ति का एक उदाहरण : कोई लौकिक विषयासक्त पुरुष मेघों से आवृत अमावस्या तिथि को उन विषयों से मुक्ति का उपाय जानने के लिये किसी योग्य गुरु के पास पहुँचा ॥२३॥
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कोऊ एक मुमुक्षु कौं, दीयौ गुरु उपदेश । 
सुन्दर वा सौं यौं कह्यौ, यह संसार कलेश ॥२४॥
गुरुदेव ने उस को विषयभोगों की हीनता बताते हुए इस नश्वर संसार को क्लेशमय(दुःखमय) बताया ॥२४॥
(क्रमशः)

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