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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ४१/४४
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दुख नहिं अंतहकरन कौं, जिनतें देह प्रवृत्य ।
सुंदर दुख नहिं त्रिगुन कौं, यह तुम जानहु सत्य ॥४१॥
इसी प्रकार, यह दुःख न अन्तःकरण को होता है जिससे सूक्ष्म शरीर की रचना होती है; न यह दुःख सत्त्व रज तम - इन तीन गुणों को ही होता है - यह बात तुम सत्य मानो ॥४१॥
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दुःख नहीं महतत्व कौं, प्रकृति सु तौ जडरूप ।
सुन्दर दुख नहिं पुरुष कौं, सूक्षम तत्व अनूप ॥४२॥
न यह दुःख महत् तत्त्व को होता है, न प्रकृति को; क्योंकि प्रकृति तो जड है, वह क्या सुख दुःख का अनुभव करेगी । रह गयी बात पुरुष की, तो वह क्या इसे अनुभव करेगा, वह तो अनुपम सूक्ष्म तत्त्व है । वह केवल साक्षी होता है ॥४२॥
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जड चेतन संयोग तें, उपज्यौ एक अज्ञान ।
सुन्दर दुख ताकौं भयौ, सद्गुरु कहै सुजान ॥४३॥
[अब शिष्य यह जिज्ञासा(प्रश्न) कर सकता है कि इनमें से जब कोई भी इस दुःख का अनुभव नहीं करता तो वह अनुभवकर्ता कौन है ? इस का उत्तर ज्ञानी श्रीगुरुदेव यह देते हैं -] जड(प्रकृति) एवं चेतन(पुरुष) के संयोग से अज्ञान(अविद्या) की उत्पत्ति होती है । उस अज्ञान को यह दुःख होता है, (अर्थात् इस अज्ञान के कारण देहादि को दुःख की अनुभूति का भ्रम होता है ।) ॥४३॥
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जौ बिचार यह ऊपजै, तुरत मुक्त ह्वै जाइ ।
सुन्दर छूटै दुखन तें, पद आनंद समाइ ॥४४॥
यदि कोई विवेकी जिज्ञासु स्वविवेकपूर्वक हमारे इस कथन का यथार्थ समझ ले तो वह इस भ्रमजाल से मुक्त हो सकता है । तथा वह आनन्दमय परमपद(निर्वाण = मुक्ति) प्राप्त कर सकता है ॥४४॥
(क्रमशः)

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