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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२८. आत्म अनुभव कौ अंग १/४
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मुख तैं कह्यौ न जात है, अनुभव कौ आनंद ।
सुन्दर संमुझै आपु कौं, जहां न कोई द्वंद्व ॥१॥
{महात्मा श्रीसुन्दरदासजी इस अङ्ग में उस निरञ्जन निराकार के साक्षात्कार के दिव्य अनुभव से प्राप्त आनन्द का विस्तृत विवरण दे रहे हैं जो उन को श्रीगुरुमुख से श्रुत उपदेश के आश्रयण से की गयी साधना से प्राप्त हुआ था ।}
वे कहते हैं - इस आत्मानन्द के अनुभव का वर्णन हम अपने मुख से नहीं कर सकते; क्योंकि यह अनिर्वचनीय है । यह स्वयं अपने उस हृदय में ही समझने की वस्तु है जहाँ अब किसी प्रकार के द्वैत की भ्रान्ति नहीं रह गयी है ॥१॥
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उमगि चलत है कहन कौं, कछू कह्यौ नहिं जाइ ।
सुन्दर लहरि समुद्र मैं, उपजै बहुरि समाइ ॥२॥
इस दिव्य अनुभव के विषय में जब हम कुछ कहना आरम्भ करते हैं तो हम कुछ भी कहने में असमर्थ हो जाते हैं; क्यों कि हमारे हृदय समुद्र में जब एतद्विषयक आनन्द की लहर(तरङ्ग) उठती है तो वह पुनः वहीं समा जाती(रह जाती) है ॥२॥
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कह्यौ कछू नहिं जात है, अनुभव आतम सुक्ख ।
सुन्दर आवै कंठ लौं, निकसत नांहि न मुक्ख ॥३॥
अतः हम उस आत्मानन्द के उस दिव्य अनुभव के विषय में कुछ भी कहने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं । वह वर्णन हेतु हमारे कण्ठ तक आकर भी मुख से नहीं निकल पाता ॥३॥
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सुन्दर जैसें सर्करा, गूंगै खाई होइ ।
मुख सौं कहि आवै नहीं, कांख बजावै सोइ ॥४॥
जैसे कोई गूंगा(वाणीविहीन) पुरुष स्वयं मीठा गुड(शक्कर) खा कर भी उस का स्वाद(जायका) दूसरों के सम्मुख अपनी बाणी के माध्यम से नहीं कह पाता । उस समय वह अपनी कांख(बाहुओं के मूल का गड्ढा) हथेली से बजाता हुआ केवल हर्ष प्रकट करके ही रह जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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