*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~५७/६०*
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*सुमिरन में सुकृत सबै, जे मन वच कर्म होय ।*
*जन रज्जब जगपति मिले, भेद न भासे कोय ॥५७॥*
यदि मन, वचन, कर्म से हो तो, हरि-स्मरण में सभी सुकर्मों का फल स्थित है, स्वयं जगदीश्वर का साक्षात्कार भी होता है और कोई प्रकार का भेद-भाव भी नहीं दिखता ।
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*सब सुकृत सेवक किये, जब जीव जगपति लीन ।*
*रज्जब राम विसार तों, विविध बुराई कीन ॥५८॥*
जब मन जगदीश्वर के स्मरण में लीन हो जाता है, तब समझना चाहिये कि - इस भक्त ने सभी सुकृत कर लिये और राम को भूलता है तो समझो उसने नाना प्रकार की बुराइयाँ कर डाली ।
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*नाम लेत नेकी उदय, बदी विसारत होय ।*
*जन रज्जब जानी जुगति, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥५९॥*
हरि-स्मरण करने से भलाई का जन्म होता है और नाम को भूलने से बुराई का जन्म होता है । भलाई, बुराई के उदय की उक्त युक्ति हमने जान ली है, इससे दोनों प्रत्यक्ष दिखती है ।
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*रज्जब तिरिये राम भज, बूडे राम विसार ।*
*जगपति जाण्यों जीत है, हृदय नहीं तो हार ॥६०॥*
राम के भजन से प्राणी संसार से पार होता है और राम को भूलने से संसार में डूबता है । जगदीश्वर का स्वरूप जानने से तो संसार में प्राणी की जीत होती है और हृदय में राम का चिन्तन नहीं हो तो हार होती है ।
(क्रमशः)

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