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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.२८. आत्म अनुभव कौ अंग ४९/५१
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सुन्दर तत्व जुदे जुदे, राख्या नाम शरीर ।
ज्यौं कदली के खम्भ मैं, कौंन बस्तु कहि बीर ॥४९॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - पृथक् पृथक् अनेक तत्त्वों से बने इस सङ्घात का नाम 'शरीर' उसी प्रकार घोषित कर दिया गया है, जैसे कि अनेक परतों से बने होने पर भी कदली स्तम्भ को, कोई सार वस्तु न होने पर भी, सङ्घात रूप में 'केले का वृक्ष' कह दिया जाता है ॥४९॥
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है सौ सुन्दर है सदा, नहीं सु सुन्दर नांहिं ।
नहीं सु परगट देखिये, है सौ लहिये मांहिं ॥५०॥
आत्मा सदा नित्य, शुद्ध, चेतन एवं निरन्तर एकरस है वह विकाररहित(अविनाशी) है । जो तत्त्व ऐसा नहीं है वह अभावरूप है । उस का कभी भाव(सत्ता) नहीं होता । अर्थात् माया मिथ्या होते हुए त्रिकालाबाधित सत्य नहीं हो सकती; क्योंकि यह माया क्षर एवं नाशवान् होने के कारण व्यवहार में भासमान तो अवश्य होती है, परन्तु वह वस्तुतः है नहीं ॥५०॥
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बिरवा बुद्धि गुलाब है, शब्द सु फूल प्रकास ।
सुन्दर आतम ज्ञान कौं, अनुभौ मध्य सुबास ॥५१॥
इति आतम अनुभव कौ अंग ॥२८॥
ज्ञान की तीन अवस्थाएँ : आत्मा का साक्षात्कार पुष्प की सुगन्ध के ज्ञान के सदृश है । यहाँ वृक्ष का ज्ञान साधारण ज्ञान कहलाता है । उस वृक्ष में लगे पुष्प से उस का विशेष ज्ञान कहलाता है । पुष्प की सुगन्ध से उस का पूर्ण ज्ञान हुआ । जैसे वृक्ष या पुष्प के दर्शनमात्र से गन्ध का ज्ञान नहीं हो पाता; इसी प्रकार आत्मा के ज्ञान के विषय में भी समझना चाहिये ॥५१॥
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इति आत्मानुभव का अंग सम्पन्न ॥२८॥
(क्रमशः)

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