सोमवार, 8 जून 2026

२६. बिचार कौ अंग ४५/४७

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२६. बिचार कौ अंग ४५/४७ 
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यह बिचार सुख रूप है, और बसै दुख रासि । 
सुन्दर या तैं कटत है, नाना बिधि की पासि ॥४५॥
जिज्ञासु का यह विवेक ही उसे परम आनन्द की प्राप्ति करा सकता है । अन्य बातें तो उसके लिये दुःख की उत्पादक(हेतु) हैं । इस उपर्युक्त उत्तम विवेक के द्वारा ही जिज्ञासु इस सांसारिक बन्धन(भवपाश) से मुक्त हो सकेगा ॥४५॥
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भरमावन कौं और सब, पहुंचावन कौं एक । 
सुन्दर साधू कहत हैं, जाकौ नाम बिबेक ॥४६॥
भेदवादियों द्वारा कथित अन्य सभी मत भ्रमोत्पादक ही हैं । सत्य मार्ग पर पहुँचाने वाला सन्तमत का विवेक ही है, जिस का हम अभी ऊपर वर्णन कर आये हैं ॥४६॥
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याही एक बिचार तें, आतम अनुभव होइ । 
सुन्दर संमुझै आपुकौं, संशय रहै न कोइ ॥४७॥
इस एक विवेकपद्धति का अनुसरण करने पर ही तुम में आत्म-साक्षात्कार की क्षमता आ सकती है । यदि कोई जिज्ञासु इस पद्धति से स्वरूप की स्थिति समझ लेता है तो उसके सम्मुख कोई भ्रमात्मक ज्ञान नहीं टिक सकता ॥४७॥
(क्रमशः)

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