*#daduji*
*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद् दादू पंथ प्रकाश”
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आज यहाँ हम कुछ प्रसंग वर्तमान में प्रकाशित ग्रंथ “श्रीमद् दादू पंथ प्रकाश” से ले रहे हैं ~
*श्रीमद् दादू पंथ प्रकाश(१)*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर (१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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ध्येय मंत्र-
दादू सुकृत मारग चालतां, बुरा न कबहुँ होय ।
अमृत खाता प्राणियाँ, मुवा न सुणियाँ कोय ॥
श्रीदादूवाणी ॥13/127 ॥
“सुकृत मार्ग पर चलते हुए कभी बुरा अर्थात् अनिष्ट नहीं होता । जैसे अमृत खाने से कभी कोई मरा हुआ नहीं सुना गया ।”
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“इस स्वीकृत ‘ध्येय मंत्र’(सद्गुरु श्री दादूजी के उपदेश) पर अत्यन्त दृढ़ता से चलने वाले प.पू. पीठाधीश्वर (19) अनंत श्री हरिरामाचार्य जी महाराज ने अपने जीवन का लक्ष्य संधारित किया और गुरु गद्दी पर बैठने से अवसान पर्यन्त इस ‘ध्येय मंत्र’ का मनसा वाचा-कर्मणा पालन किया ।”
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इस ध्येय मंत्र को विविध प्रमाणों से सुनिश्चित एवं हृदयंगमकर जैसा कि श्रीमद्भगवद् गीता में अध्याय 6 में भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है~
‘पार्थ ! नैवेह नामुत्र, विनाशस्तस्य विद्यत ॥
न हि कल्याण कृत कश्चित्, दुर्गतिं तात ! गच्छति ॥’गीता 6/40
हे पुत्र ! कल्याण कार्यों में निरत योगी का न तो इस लोक में और न परलोक में ही नाश होता है । हे प्रिय ! भलाई करने वाला कभी बुराई से पराजित नहीं होता ।
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अन्यच्च~ श्रीमद्भागवत (1.5.97) में श्री नारदमुनि व्यासदेव को इस प्रकार उपदेश देते हैं~ “त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजन्नपक्वोऽथ पतत्ततो यदि ।”
“यदि कोई समस्त भौतिक आशाओं को त्यागकर भगवान् की शरण में जाता है तो इसमें न तो कोई क्षति होती है और न पतन ।”
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“इस ‘ध्येय मंत्र’ का यावज्जीवन पालन करने वाले परम आचार्य श्री हरिरामजी महाराज(चरित्र नायक) दादूपंध के 19 वें पीठाधीश्वर का संक्षिप्त जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हुये संतोषानुभूति होती है ।”

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