रविवार, 5 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १७/२०
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कारन तैं कारज भयौ, कारन कारज एक । 
जैसैं कंचन तैं कियौ, सुन्दर घाट अनेक ॥१७॥
यद्यपि कारण से कार्य होता है तो भी यथार्थतः कारण एवं कार्य हैं तो एक ही । जैसे एक सुवर्ण रूप कारण से आभूषणादि अनेक कार्य कर लिये जाते हैं ॥१७॥ (द्र० - सवैया : ३२/१४ छ०)
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जैसे कीये मैंन के, हय हाथी बहु जन्त । 
सुन्दर ऐसैं ब्रह्म है, आदि मध्य अरु अन्त ॥१८॥
जैसे एक ही मोम से हाथी आदि घोड़ा की अनेक आकृतियाँ बना ली जाती हैं; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ० )
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जैसैं मनिका सूत के, बीचि सूत कौ तार । 
ऐसै सुन्दर ब्रह्म सब, या ही है निरधार ॥१९॥
जैसे माला की सभी मणियाँ बीज में पड़े हुए सूत पर आधृत होती है; उसी प्रकार इस समस्त जगत् के आदि, मध्य एवं अन्त में एकमात्र ब्रह्म ही दिखायी देता है - ऐसा समझें ॥१८॥ (द्र०- सवैया : ३२/१६ छ०)
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सुन्दर तानां सूत का, बानै बुनियां सूत । 
नाव धर्यौ फिरि और ही, यथा बाप तैं पूत ॥२०॥
किसी वस्त्र के निर्माण के लिये ताना एवं वाना का सूत एक ही होता है; परन्तु व्यवहार में उसे 'ताना' एवं 'वाना' कह देते हैं । या पिता से ही पुत्र होता है; परन्तु व्यवहार में उन को 'पिता' एवं 'पुत्र' कह देते हैं । यही स्थिति जगत् के विषय में ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥२०॥ (द्र०- सवैया ३२/६ छ०)
(क्रमशः) 

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