गुरुवार, 9 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~९३/९५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~९३/९५*
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*लिख्या पढ्या सीख्या सुण्या, जीव कह्या जब राम ।*
*मनसा वाचा कर्मना, येता१ ही है काम ॥९३॥*
जिस जीव ने अपने जीवन में निरंतर राम-नाम स्मरण कर लिया तो समझना चाहिये, उसने सब कुछ लिख लिया, पढ़ लिया, सीख लिया और सुन लिया । हम तो मन, वचन, कर्म से कहते हैं कि उक्त प्रकार स्मरण करके राम को प्राप्त करले बस, जीवन के लिये इतना१ ही कर्तव्य कर्म है ।
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*पाव नाम छाडै संसारा, अर्ध नाम शरीर विसारा ।*
*पौंण नाम जीव वृत्ति त्यागी, सेर नाम साँई सुरति लागी ॥९४॥*
संसार भावना छुट जाय तब पाव भर स्मरण, शरीर की आसक्ति त्याग दे तब आध सेर, जीवपने की वृत्तियों को त्याग दे तब तीन पाव और निरंतर परब्रह्म में वृत्ति लगी रहे तब समझना चाहिये सेर भर स्मरण हुआ है अर्थात यही स्मरण की पूर्णावस्था है ।
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*नींद लागि होई निरमूलै, तो सुमिरण संग क्यों न सब भूलै ।*
*पास पसारा परसे नाँहीं, यूं रज्जब न्यारा है माँहीं ॥९५॥*
घोर निद्रा आने पर अपने सब संसार का अभाव हो जाता है, सुषुप्ति में सम्पूर्ण अपना घरादि मायिक विस्तार पास ही है, तो भी उससे संयोग नहीं होता, वैसे ही हरि स्मरण के समय भी सब संसार को क्यों नहीं भूलते अर्थात भूलना चाहिये । साधक स्मरण द्वारा सुषुप्ति के समान संसार के भूलकर संसार में रहता हुआ भी संसार से न्यारा रहता है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२०. स्मरण का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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