रविवार, 12 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~९/१२*
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*नाम निरंजन लीजिये, तन मन आतम माँहिं ।*
*जन रज्जब यूं सुमिरतों, परम पुरुष मिल जाँहिं ॥९॥*
तन, मन और बुद्धि को परमात्मपरायण करके निरंजन ब्रह्म का नाम चिन्तन करना चाहिये, इस प्रकार स्मरण करने से परम पुरुष परमात्मा मिल जाते हैं ।
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*सु स्थिर आतम एक पल, रज्जब भज ही राम ।*
*मन मोती ज्यों नीपजे, स्वाति नक्षत्री नाम ॥१०॥*
एक क्षण भी बुद्धि को स्थिर करके राम का भजन किया जाय तो जैसे स्वाति नक्षत्र के जल से शुक्ति में मोती उत्पन्न होता है, वैसे ही मन ज्ञान उत्पन्न हो जाता है ।
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*नहीं सु निकसे आरसी, छति१ सु गायब होय ।*
*रज्जब दरपन सती के, प्रत्यक्ष दीसे दोय ॥११॥*
सती होने वाली माता के अंगुष्ठ से आरसी नामक भूषण तो नहीं निकलता, वह होता१ हुआ भी लुप्त हो जाता है, किन्तु सती का अन्त:करण-दर्पण है उससे यह लोक और परलोक दोनों ही दीखते हैं । वैसे ही साधक का इन्द्रिय ज्ञान तो लुप्त हो जाता है किन्तु भजन द्वारा प्राप्त ज्ञान-दर्पण से उसे ब्रह्म के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूप प्रत्यक्ष दीखते हैं ।
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*रज्जब साधु सती रामहि कहै, पर हरि तन मन धन प्रीति ।*
*इष्ट अभ्यासे उभय को, तज भजणी रस रीति ॥१२॥*
सती तन धनादि की प्रीति को त्यागकर अपने अभीष्ठ पतिदेव में ही मन को स्थिर रखती है, चिता की ज्वाला को देखकर भागने का विचार नहीं करती, वैसे ही साधु तन धनादि की प्रीति तथा दौड़कर विषयों में जाने की रस रीति को त्याग कर अपने इष्ट निरंजन ब्रह्म में वृत्ति स्थिर रखता है ।
(क्रमशः)

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