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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४५/४७
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ज्यौं रवि के उद्योत तें, अंधकार भ्रम दूरि ।
सुन्दर ब्रह्म बिचार तें, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥४५॥
जैसे सूर्य के उदित होते ही अन्धकार सर्वथा नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म पर विचार करते हुए उस का साक्षात्कार होने पर, जगत् का भ्रम सर्वथा मिट जाता है और उसे सब कुछ ब्रह्ममय ही दिखायी देता है ॥४५॥
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सुन्दर "सर्वं खलु इदं, ब्रह्म" कहतु हैं वेद ।
चतुर श्लोकी मांहिं पुनि, सकल मिटायौ भेद ॥४६॥
वेदादि सब शास्त्रों में एकमात्र ब्रह्म का ही निरूपण : यदि श्रुति को प्रमाण माना जाय तो वह कहती है - 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन' (यह सब कुछ दृश्यमान ब्रह्म ही है, दूसरा कोई नहीं है) । चतुःश्लोकी भागवतपुराण भी इसी मत को पुष्ट करता है ॥४६॥
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सुन्दर कह्यौ वसिष्ठ पुनि, रामचन्द्र सौं ज्ञांन ।
ब्रह्म बतायौ एक ही, दूरि कियौ भ्रम आंन ॥४७॥
योगवाशिष्ठ ग्रन्थ में वसिष्ठ मुनि ने भी श्रीरामचन्द्र को ब्रह्मज्ञान का ही उपदेश कर ब्रह्म को एक बताते हुए जगत् को भ्रान्तिमय ही सिद्ध किया है ॥४७॥
(क्रमशः)

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