मंगलवार, 14 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग १/४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. अथ ज्ञानी कौ अंग
[इस अङ्ग का यथार्थ(मर्म) समझने के लिये जिज्ञासु को "सवैया" ग्रन्थ का ज्ञानी का अंग(२९) भी हृदयङ्गम कर लेना चाहिये ।]
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सुन्दर ज्ञानी जगत मैं, बिचरै सदा अलिप्त । 
यह गुन जानै देह कै, भूखो रहै क तृप्त ॥१॥
जिस साधक के शुद्ध हृदय में निरञ्जन निराकार प्रभु का साक्षात्कार(प्रत्यक्ष दर्शन) हो जाता है वह ज्ञानी साधक, इस स्थिति में पहुँचने पर, इस संसार के माया मोह से दूर हो जाता है, उसमें उस की कोई आसक्ति नहीं रह जाती; क्योंकि वह अपनी देह(शरीर) की अशुभ, अनित्य एवं असुख आदि न्यूनताएँ भली भाँति पहचान चुका होता है । अतः वह भूख, प्यास, शीत उष्ण, मान अपमान आदि आनुषङ्गिक कष्टों की उपेक्षा ही करता रहता है ॥१॥
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खाइ पिवै देखै सुनै, सुन्दर ले पुनि स्वास । 
सांधै तीर पताल कौं, फिरि मारै आकास ॥२॥
ज्ञानी की सांसारिक व्यवहारों में उपेक्षा : अतः वह ज्ञानी साधक खाता पीता हुआ, उठता बैठता हुआ, श्वास लेता हुआ भी इन क्रियाओं की उपेक्षा ही करता रहता है । कभी कभी तो उसकी दैहिक क्रियाओं में विरोधाभास(प्रतिकूलता) भी दिखायी देता है । जैसे - उस की किसी क्रिया से ऐसा प्रतीत होता है कि उसका लक्ष्य पाताल(नीचे) की ओर है; परन्तु वस्तुतः वह लक्ष्य होता है आकाश(ऊपर उच्चतम साधना) की ओर ॥२॥
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देखै परि देखै नहीं, सुनता सुनै न कांन । 
जानै सब जानै नहीं, सुन्दर ऐसा ज्ञांन ॥३॥
तब वह ज्ञानी किसी दृश्य को देखता हुआ इसमें कोई ज्ञान नहीं रखता, कानों से कुछ सुनता हुआ भी उसमें कोई आसक्ति प्रकट नहीं करता । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - उस स्थिति में पहुँचने पर, ज्ञानी का लौकिक ज्ञान व्यवहारमात्र रह जाता है उसमें उसका कुछ भी रागानुषङ्ग(वास्तविकता) नहीं रहता ॥३॥
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भक्ष करै न भखै कछू, सूंघत सूंघै नांहिं । 
ऐसै लक्षण देखिये, सुन्दर ज्ञानी मांहिं ॥४॥
वह संसार में लौकिक पुरुषों के समान ही खाता हुआ या सूंघता हुआ दिखायी देता है; परन्तु उसकी जिह्वा या श्रवण इन्द्रियाँ उन खाद्य या श्रव्य पदार्थों के स्वाद(रस) में आसक्त नहीं होतीं - यही उस ज्ञानी के ज्ञान का अलौकिक लक्षण(चमत्कार) है ! ॥४॥
(क्रमशः)

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