🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
.
अथ खालसा पर्व २ ~
दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवत: ।
वन्दनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगत: ॥
अथ अध्याय १ = श्री गरीबदासोतों का परिचय~
इनमें ४ थामें हैं~ १ मांदी, २ गिदाणी, ३ खाचरिया वास, ४ जोधपुर ।
महन्त गादी नारायणा में है ।
गरीबदासजी के गद्दी के महन्त १-केवलरामजी, २- रामदासजी, ३- आनन्दीरामजी, ४-कृपारामजी, ५- जादूरामजी, ६- खेमदासजी, ७- भगवानदासजी, ८- सूरतरामजी, ९- रामनारायणजी, १०- गोविन्ददासजी, ११- बोलातारामजी, १२- चेतनदासजी, १३- गोवर्धनदासजी, १४- भजनदासजी ।
.
१- गरीबदासजी के जीवितावस्था में ही दादूजी की गद्दी त्याग देने से उनकी गद्दी अलग हो गई । गरीबदासजी के मुख्य शिष्य केवलरामजी थे, जो बड़े सिद्ध पुरुष थे । उनकी सिद्धि का एक उदाहरण आचार्य पर्व के अध्याय १ के अन्त में दिया जा चुका है । केवलरामजी किशनगढ़ नरेश के सुझाव से दादूजी महाराज की गद्दी का मोह त्यागकर जहांगीर के बनाये हुये गरीबदासजी के महल में रहने लग गये थे ।
इन केवलरामजी आदि गरीबदासजी के शिष्यों की जो आगे शिष्य परंपरा चली उसी के संत गरीबदासोत कहलाते हैं । केवलरामजी के मुख्य ३६ शिष्य थे और भी थे । ३६ की परंपरा के ३६ स्थान अलग अलग थे, यह स्थान-परिचय में देंगे । केवलरामजी जैसे सिद्ध पुरुष थे वैसे वाणीकार संत कवि भी थे ।
.
भक्तमालकार राघवदासजी ने लिखा है~
छप्पय~
प्रेम भक्ति को पुंज, रचे पद साखी नीके ।
करुणा विरह वियोग, सुनत उद्धारक जीके ॥
जो चल आवे साधु, बहुत तिन आदर करही ।
भजन भाव सतशील, देख सब का मन ढरही ॥
राघव महिमा करत जो, सुख पावैं नारि नर ।
स्वामी गरीबदास के, टीके केवलराम वर ॥६२०॥
उक्त पद से ज्ञात होता है कि इनकी वाणी में साखी तथा गेय पद हैं ।
.
उदाहरण पद~
कहा करूं मेरो लाल रिसायो,
मैं मन्द भागन मर्म न जानो, मनमोहन से मन न लगायो ॥टेक॥
मोहि यह जन्म कहा दियो माई, जो मोरे श्यामसुन्दर नहिं आयो ।
धृक यह जन्म मिले नहिं माधव, जननी जन्मत विष किन पायो ॥१॥
सुनरी सखी सब अवगुण मेरे, तातैं पीव परदेश हि छायो ।
आतुर भई दशोंदिशि हेरूं, कौन सुहागिन जिन विलमायो ॥२॥
धरकत हृदय धीर नहिं धरही, ज्यूं ज्यूं अवसर जात सिरायो ।
कहूँ कौन से कहो मेरी सजनी, परम सनेही महल न आयो ॥३॥
मैं उनकी वे प्रीतम मेरे, यह मन जाके हाथ बिकायो ।
'केवल' जन्म सफल उन देख्यों, नाहिं ता यह तन बादि गमायो ॥४॥
.
अकल पुरुष की आरती कीजे, युग युग राम अमर पद लीजे ॥टेक॥
चित चंदन मनसा की माला, ध्यान धूप मन पहुप रसाला ॥१॥
अखंड ब्रह्म सो इष्ट हमारा, सकल लोक जाका विस्तारा ॥२॥
ज्योति स्वरूप जगत उजियारा, ताहि सुमिर जन उतरे पारा ॥३॥
झिलमिल झिलमिल नूर प्रकाशा, तहँ केवल को देहु निवासा ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें