शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~७३/७६*
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सप्त धातु पलटे सुतन, परसे पारस नाँउ ।
रज्जब कटे कलंक कुल, प्रभु प्रभुता बलि जाँउ ॥७३॥
जाति पारस के स्पर्श से सातों ही धातु सब दोषों से रहित होकर बदल जाती है, वैसे ही परमात्मा के नाम-स्मरण से संपूर्ण दोष नष्ट होकर उभय शरीर में शुद्धता रूप परिवर्तन हो जाता है, अत: उस प्रभु की प्रभुता की बलिहारी जाता हूँ ।
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हरि सुमिरण संशय हरे, पाप जाप सौं जाँहिं ।
जन रज्जब जगदीश भज, नौ निधि है जा माँहिं ॥७४॥
हरि नाम जप से पाप नष्ट हो जाते हैं, हरि-स्मरण ज्ञान द्वारा संशय हर लेता है, जिसके भजन में नौ निधि भी स्थित है, उस जगदीश्वर का ही निरन्तर भजन कर ।
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कर्म हुँ कर्म सु नाम निज, जम का जम हरि जाप ।
रज्जब रटतों ना रहे, प्राणी पिंड के पाप ॥७५॥
राम नाम का स्मरण अपने श्रेष्ठ कर्मों से भी श्रेष्ठ कर्म है, यम का भी यम है, अर्थात यम को भी दंड देने वाला है । राम नाम - स्मरण करने से प्राणी के शरीर के पाप नष्ट हो जाते हैं ।
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रज्जब बीरज नाम निज, रिधि सिधि डाल बतीस ।
पहुप पत्र प्रभुता अनन्त, राम नाम फल शीस ॥७६॥
साधना वृक्ष का निज नाम बीज है, अठारह सिद्धियों और चौदह रत्न रूप ऋद्धि ये ३२ डाल हैं, और भी जो अनन्त प्रकार की प्रभुता हैं, वे ही पत्र पुष्प हैं, इसके शिर पर पुन: राम नाम रूप ही फल आता है, अर्थात साधन के आरम्भ में भी नाम और अंत में भी नाम स्मरण ही रहता है, यह नाम की महान् की विशेषता है ।
(क्रमशः)

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