शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ९/१२
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दीप मसाल चिराक बहु, दौं लागी घर लाइ ।
सुन्दर पावक एक ही, ऐसैं ब्रह्म दिखाइ ॥९॥
जैसे दीपक, मशाल(लाठी पर तेल से भीगा कपड़ा लपेट कर जलाया जाने वाला प्रकाशस्तम्भ) एवं चिराग(लैम्प) की अग्नि तथा घ्घ्र को जलाने वाली सब एक ही हैं तो भी व्यवहार में वे भिन्न भिन्न कहलाती हैं; वैसे ही यह समस्त ब्रह्माण्ड में व्यापक ब्रह्म भी एक ही है ॥९॥ (द्र० - सवैया : ३२/४ छ०)
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सुन्दर यहु सब ब्रह्म है, नाम धर्यौ संसार ।
एक बीज तें पलटि कैं, हूवौ बृक्षाकार ॥१०॥
जैसे लोकव्यवहार में बीज के अंकुरित होते ही उस को वृक्ष कह दिया जाता है उसी प्रकार इस समस्त संसार की भी ब्रह्म से ही उत्पत्ति है । केवल व्यवहार में जनसाधारण इसे 'संसार' कहने लगता है ॥१०॥ (५० सवैया ३२/६ छ०)
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सुन्दर सबकी आदि है, सुन्दर सबका मूल ।
यथा बृक्ष मैं देखिये, डाल पांन फल फूल ॥११॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वह ब्रह्म ही इस समस्त संसार का आदि है, तथा इस का मूल(जड) भी यही है । जैसे बीज से ही वृक्ष के शाखा, पत्र, पुष्प एवं फल दिखायी देते हैं; वही स्थिति इस ब्रह्माण्ड के लिये ब्रह्म की भी समझनी चाहिये ॥११॥ (द्र० - सवैया : ३२/६ छ०)
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भयौ सरकरा ईक्षु रस, ब्यापि मिठाई मांहिं ।
सुन्दर ब्रह्म सु जगत है, जगत ब्रह्म द्वै नांहिं ॥१२॥
जैसे सभी मिठाइयों में ईख का मीठा रस(शक्कर) सर्वत्र व्याप्त रहता है, वैसे इस समस्त संसार में ब्रह्म व्याप्त है । अतः इस संसार एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है । दोनों एक ही हैं ॥१२॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
(क्रमशः)

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