🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*आपा गर्व गुमान तज, मद मत्सर अहंकार ।*
*गहै गरीबी बन्दगी, सेवा सिरजनहार ॥*
.
१९ प्रभुदासजी = प्रभुदासजी लालदासजी के अस्थल में दीक्षित हुये थे । प्रभुदासजी ने संगीत का बहुत अच्छा अभ्यास किया था । उनकी संगीत कला से प्रभावित होकर तत्कालीन जैसलमेर नरेश ने उनको अपने पास बुला लिया था । वहां उनको राज्य की ओर से एक रुपया रोज मिलता था । उनका देहान्त जैसलमेर में ही वि. सं. १९३४ के पश्चात् हुआ था ।
.
२० ब्रह्मचारी = ब्रह्मदासजी हरनाथजी दादू पंथी के शिष्य थे । ये हरनाथजी लालदासजी के ही शिष्य होंगे । कारण, लालदासजी के शिष्यों में रामनारायण जी जोधपुर अस्थल वालों ने ब्रह्मदासजी को भी गिनाया था । किन्तु ब्रह्मदासजी की भक्त माल के टीकाकार ने ब्रह्मदासजी को हरनाथजी का शिष्य लिखा है अतः ब्रह्मदासजी लालदासजी के पौत्र शिष्य हो सकते हैं ।
.
ब्रह्मदासजी पोकरण(मारवाड़) के पास माडवा ग्राम के विठू शाखा के चारण जगा के पुत्र थे । विसनदानजी(विष्णुदान ) इनका पूर्व नाम था । ये अविवाहित थे । चारण होने से कविता करने में इनकी स्वाभाविक ही रुचि थी । ये राजस्थानी डिंगल के अच्छे कवि थे । फिर साधु होने से ईश्वर गुणगान ही उनका कर्तव्य हो गया था । इससे उन्होंने भक्तमाल की रचना की और उसको ६ भागों में विभक्त किया है ।
.
उनकी भक्तमाल का सटीक संपादन राजस्थान पुरातत्त्व ग्रंथ माला में ग्रंथांक ४३ में जोधपुर से छपा है । उस भक्तमाल में ११४ भक्तों की कथायें हैं । उन कथाओं में अपने पंथ के संत दादूजी आदि की भी कहायें दी हैं । ब्रह्मदासजी जोधपुर नरेश विजयसिंहजी के समय में बिद्यमान थे । वि. सं. १८१६ में विजयसिंहजी ने पोकरण के वीर बुद्धिमान् ठाकुर देवीसिंहजी आदि चार बड़े सरदारों को किले पर धोका देकर पकड़वाये और मरवा दिये थे ।
.
तब स्पष्ट वक्ता ब्रह्मदासजी ने उपालम्भ रूप एक गीत विजयसिंहजी को सुनाया था । राजा ने इनको संत जान कर इतना ही कहा~ अभी आपका चारणपना तो दूर नहीं हुआ है । ब्रह्मदासजी ने अपना साधन धाम ओसियां में पहाड़ी पर सच्चई देवी के मंदिर के पास में बनवाया था । वह अभी भी ब्रह्मदासजी के दादूद्वारे के नाम से ओसियां में प्रसिद्ध है ।
.
ब्रह्मदासजी की रचनायें ~ ब्रह्मदासजी रचित १- भक्तमाल प्रकाशित है । २- कुछ गीत भी मिलते हैं । उदाहरण गीत नं.१~
अद्भुत गत राम न तो पै आग्या, इन्द्र चन्द्रमुख संशक आप ।
भाव तणा लादांरो भूखो, बांदारो बांदों मा बाप ॥१॥
कोट अनन्त ब्रहमांडरो करता, कोट अनन्त दईतां चौ काल ।
बोलांरो संचौ निरवाहण, गोलांरो गोलों गोपाल ॥२॥
मोटा धणी अचंभो मोटो, चट सूरापण निपट घणों ।
ठावौ सकल सकलरौ ठाकर, तूं चाकर चांकरां तणों ॥३॥
दास ब्रह्म झूठी नहदाखै, माधव कछु बुरो मत मान ।
तीन लोक घर रह्यो भरतियो(भृत्य), छीपा तणी छवाई छाँन ॥४॥
बाबा तूं पारथ रथ बैठो, दास थकौ मोटो दातार ।
शेष महेश सूर सस(शशि) सांमी(स्वामी) पढ़ता विरदन पावे पार ॥५॥
.
यह भक्तमाल के छ्ठे भाग का एक नं. गीत है । ब्रह्मदासजी ने अपनी भक्तमाल के छंदों के समस्त चरणों में वैणय-सगाई अलंकार का अच्छा निर्वाह किया है । इनके ब्रह्मलीन होने का निश्चित पता नहीं ज्ञात हो सका है, किन्तु संभव है विक्रम की १९ वीं शताब्दी के मध्य भाग में ही अपने साधन धाम ओसियां में ही ये ब्रह्मलीन हुये होंगे । ये भी गरीबदासोतों में एक अछे संत कवि हो गये हैं ।
इति श्री प्रथम भाग समाप्तः ॥१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें