गुरुवार, 23 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ४१/४४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४१/४४
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तवा माहिं नहिं देखिये, सूरय कौ उद्दोत । 
सुन्दर मूंधी आरसी, तामैं कछूक होत ॥४१॥
आप कितना भी प्रयास करें, तवा(रोटी सेकने का लौहपात्र) में मुख का प्रतिबिम्ब नहीं देखा जा सकता । हाँ, आरसी(दर्पण) को अधोमुख करें तो उस में सूर्य की कुछ चमक प्रतीत होती है ॥४१॥
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जब दर्पन सूधौ करै, रवि आभासै आइ ।
सुन्दर दर्पन मिटि गयें, सूरय ई रहि जाइ ॥४२॥
हाँ, दर्पण(शीशा) को यदि आप ऊर्ध्वमुख करें तो उसमें सूर्य की कान्ति(प्रतिबिम्ब) स्पष्ट दिखायी देती है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वहाँ यदि दर्पण को हटा दिया जाय तो वहाँ केवल सूर्य ही प्रत्यक्ष रह जायगा ॥४२॥
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जीव ब्रह्म मिलि जात है, सुन्दर उपजें ज्ञांन । 
दूर भयौ प्रतिबिंब जब, रह्यौ एक ही भांन ॥४३॥
इसी प्रकार, जीव एवं ब्रह्म के मिलने पर ज्ञान होता है; क्योंकि उस समय जीव में ब्रह्म का प्रतिबिम्ब पड़ता है । यदि वहाँ जीव को हटा दिया जाय तब ब्रह्म एकाकी रह जायगा । इसी स्थिति(एकाकी ज्ञान) को कहते हैं - साक्षाद् दर्शन ॥४३॥
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सुन्दर ज्ञान प्रकास तैं, धोखौ रहै न कोइ । 
भावै घर माहें रहौ, भावै बन मैं होइ ॥४४॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे ज्ञानी साधक के हृदय में जब ब्रह्मज्ञान का प्रकाश हो जाता है, तब उस के चित्त में ब्रह्मविषयक कोई भ्रम(धोखा) या सन्देह नहीं रह जाता । उस स्थिति में भले ही वह घर में रहे(गृहस्थ धर्म का पालन करे) या सब कुछ त्याग कर वन में चला जाय(संन्यासी परिव्राजक हो जाय) ॥४४॥
(क्रमशः)

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