शनिवार, 18 जुलाई 2026

रातड़िया ग्राम में

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*छाजन भोजन परमार्थी, आतम देव आधार ।*
*साधु सेवक राम के, दादू पर उपकार ॥*
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वर्तमान में दामोदरदासजी व उनके शिष्य दीपारामजी है । अतः मलाणा के स्थान में आज तक दो की संख्या से अधिक साधु नहीं हो सके हैं । मलाणा लालदासजी की तपोभूमी है । आगे लालदासजी मलाणा से विचरकर कुछ समय देवातड़े विराजे ।
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वहां से चामूचैराई(पोकरण फलोदी) तहसील ओसियां में पधारे फिर थली के महालाणी प्रदेश के रातड़िया ग्राम में पधारे । वहां के भक्त लालदासजी पर अब तक भी पूर्ण श्रद्धा रखते हैं । लालदासजी को परमेश्वर रूप ही मानते हैं । जोधपुर नागौरी दरवाजा के लालदासजी के स्थल में माघी पूर्णिमा को आकर बच्चों के जडूले उतारते हैं । जात देते हैं । इच्छा पूर्ति के लिये बोली हुई बोल्यारी की भेंट इच्छा पूर्ण होने पर चढ़ाते है ।
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एक समय लालदासजी भ्रमण में थे और एक स्थान पर बैठे हुये भगवद् भजन कर रहे थे । एक जाट ने उन्हें देख कर सोचा संत भूखे होंगे । वह अपने लिये चार रोटियां लाया था, उनमें से उसने एक रोटी लालदासजी को दे दी । फिर सोचने लगा । आज मेरे भोजन में एक रोटी कम रहने से भूख शीघ्र ही लगेगी और भूख लगने से काम नहीं हो सकेगा ।
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किन्तु जब वह मध्याह्र में रोटी खाने लगा तो उसे पूरी चार रोटियां मिलीं उसने संतजी को जो रोटी दी थी वह कम नहीं हुई । तब दूसरे दिन उसने लालदासजी को दो रोटी दी, तो भी भोजन के समय चार ही मिली । तीसरे दिन तीन दी तो भी भोजन के समय चार मिली । तब उसे निश्चय हो गया कि संतों की सेवा करने से वस्तुयें कम नहीं होती हैं~ कहा भी है~
"संतों की सेवा करे, वस्तु घटत है नांहिं ।
दिये जाट को रोटियां, घटी न वर्तन मांहिं ॥११३ ॥दृ. त. १३॥
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लालदासजी भ्रमण करते हुये वि.सं. १८२५ के लगभग जोधपुर में पधारे थे और नागौरी गेट के भीतर अधर शिला पहाड़ी की नीचाई में एक कैर वृक्ष की छाया में विराजे थे और वहां रह कर भजन करने लगे थे । सर्व प्रथम यहां पर कागा तीर्थ में स्नानार्थ जाने आने वाले सज्जनों ने लालदासजी को कैर वृक्ष की छाया में भजन करते हुये देखा था । फिर वे लोग स्नान करके आते थे तब आप के दर्शनार्थ व सत्संग के लिये आप के पास जाने लगे थे ।
(क्रमशः)

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