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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग १७/२०
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शब्द सुनै सो ब्रह्ममय, कहै ब्रह्ममय बैंन ।
सुन्दर ज्ञानी ब्रह्ममय, ब्रह्महि देखै नैंन ॥१७॥
वह ज्ञानी प्रत्येक शब्द या वचन को या नेत्रों से द्रष्टव्य रूप को ब्रह्मयुक्त ही मानता हुआ स्वयं को निरन्तर ब्रह्मचिन्तन में लगाये रखता है ॥१७॥
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पंच तत्व पुनि ब्रह्ममय, ब्रह्मा कीट पर्यंत ।
ज्ञानी देखै ब्रह्ममय, सुन्दर संत असंत ॥१८॥
पाँच तत्त्वों से रचित ब्रह्मा से कीट तक इस समस्त सृष्टि को भी पूर्णतः ब्रह्ममय मानता हुआ तथा सभी साधु स्वभाव या दुष्ट स्वभाव वाले प्राणियों को भी वैसा ही मानता हुआ वह सदैव ब्रह्मचिन्तन में लीन रहता है ॥१८॥
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सुंदर बिचरत ब्रह्ममय, ब्रह्म रह्या भरपूर ।
जैसैं मच्छ समुद्र मैं, कहां जाइ कहुं दूर ॥१९॥
जैसे समुद्र में तैरती हुई मछली को, कितना ही दूर जाने पर भी, सर्वत्र जल ही जल मिलता है; वैसे ही ब्रह्मानन्द में मग्न ज्ञानी को संसार में सर्वत्र ब्रह्म ही दिखायी देता है, अन्य कुछ नहीं ॥१९॥
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जौ पग पहरी पानही, कांटा चुभै न कोइ ।
सुंदर ज्ञानी सुखमई, जहां तहां सुख होइ१ ॥२०॥
(१ उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतैव भूः । - सूक्ति)
जैसे पैरों में जूता पहने हुए मनुष्य को, कण्टकाकीर्ण स्थल में जाने पर भी, कहीं कांटा नहीं चुभता; उसी प्रकार समग्र संसार को ब्रह्ममय देखने वाले ज्ञानी को कहीं भी किसी प्रकार के दुःख की प्रतीति नहीं होती ॥२०॥
(क्रमशः)

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