रविवार, 19 जुलाई 2026

उच्चकोटि का भजनानन्दी संत

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू काम धणी के नाम सौं, लोगन सौं कुछ नांहि ।*
*लोगन सौं मन ऊपली, मन की मन ही मांहि ॥*
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फिर शनैः शनैः तत्कालीन जोधपुर नरेश विजयसिंहजी के पास भी आपकी यश गाथा पहुँच गई । तब विजयसिंहजी अपने भाई भीमसिंहजी के साथ एक दिन लालदासजी के दर्शन करने आये । वे आये तब भी लालदासजी कैर वृक्ष की छाया में बैठे हुये भजन कर रहे थे । लालदासजी के दर्शन कर के जोधपुर नरेश विजयसिंहजी तथा उनके भाई भीमसिंहजी दोनों ही अति प्रसन्न हुये ।
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फिर कुछ समय सरसंग कर के राजा ने प्रार्थना की~ भगवन् ! कोई सेवा की आज्ञा दें । लालदासजी ने कहा~भगवत् कृपा से सब आनन्द है । फिर भी राजा ने अति आग्रह पूर्वक कहा~ भगवन् कोई तो सेवा अवश्य बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ सेवा बता तो दूंगा किन्तु आप लोग करोगे नहीं । राजा ने कहा~ अवश्य करूंगा आप निस्संकोच बताइये ।
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तब लालदासजी कहा~ हमारी सब से बड़ी सेवा यह है कि~ 'आप हमारे पास फिर कभी भी नहीं आना । लालदासजी का उक्त वचन सुनकर राजा कुछ देर मौन रहे । फिर बोले ठीक है, स्वामिन् ! मैं आप के पास फिर नहीं आऊंगा । किन्तु आपका इसमें क्या रहस्य है ? यह तो कृपा करके बताइये । तब लालदासजी ने कहा~ आपके बारंबार आने से आपकी प्रजा भी अति मात्रा में आने लगेगी । उस अधिक आवागमन से हमारे भजन ध्यान में विघ्न पड़ेगा । यही मेरा तात्पर्य है ।
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लालदासजी का उक्त वचन सुनकर जोधपुर नरेश विजयसिंहजी ने तथा उनके भाई भीमसिंहजी ने लालदासजी उच्चकोटि का भजनानन्दी संत समझ लिया तथा उनके विचारों से दोनों ही अति हर्षित हुये । और धन्यवाद देते हुये प्रणाम करके राजमहल को चले गये । कहा भी है~
साधक संतों को नहीं, जन समुदाय सुहाय ।
लालदास ने कह दिया, पीछे कभी न आय ॥११५। दृ.त.११॥
(क्रमशः)

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