रविवार, 19 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग २१/२४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग २१/२४
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जलचर थलचर ब्योमचर, जीवनि की गति तीन । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्मचर, जहां तहां लयलीन ॥२१॥
जैसे संसार में उत्पन्न प्राणियों की तीन ही चर्चा(गति) होती हैं । उन में १. कोई जलचर होता है, जो जल में ही रह कर सुख मानता है, २. कोई स्थलचर होता है जो स्थल(भूमि) पर रह कर ही सुख मानता है, ३. कोई नभचर होता है जो नभ(आकाश) में उडता हुआ ही सुख मानता है; उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष ब्रह्मचर होता है जो ब्रह्मानन्द में एकान्ततः निमग्न रहता हुआ ही आत्यन्तिक सुख मानता है, अन्यत्र नहीं ॥२१॥
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अपनै मन आनंद है, तौ सगरै आनंद । 
सुन्दर मन शीतल भयौ, दह दिशि शीतल चन्द ॥२२॥
महाराज सुन्दरदासजी कहते हैं - हमारा मत यह है कि यदि किसी विवेकी पुरुष का अपना मन सुख से परिपूर्ण है तो उस को संसार में भी सर्वत्र सुख ही सुख अनुभूत होता है; क्योंकि उसका अपना मन शान्त होने पर उसे समस्त संसार में भी सर्वत्र चन्द्रमा के समान शीतलता(शान्ति = आनन्द) ही प्रतीत होगी ॥२२॥
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ऊठत बैठत फिरत हूं, खातहूं पीवत प्रांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२३॥
साधना करते करते समय आने पर, उस ज्ञानी के मन की यह स्थिति हो जाती है कि उसे अपनी खाना, पीना, उठना बैठना आदि क्रियाएँ करते रहने पर भी सर्वत्र ब्रह्मानन्द रस की निरन्तर अनुभूति होती रहती है; अतः वह निरन्तर ब्रह्मचिन्तन में ही व्यस्त रहता है ॥२३॥
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जागत सोवत जोवते, सुख सौं करत बखांन । 
सुन्दर ज्ञानी कै सदा, कहिये केवल ज्ञांन ॥२४॥
वह सोते हुए, जागते हुए, किसी वस्तु को देखते हुए या किसी की प्रतीक्षा करते हुए भी ब्रह्मानन्द का ही चिन्तन, मनन या व्याख्यान करता रहता है; क्योंकि तब तक उस ज्ञानी का निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहना ही स्वभाव बन जाता है ॥२४॥
(क्रमशः) 

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