🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*सत गुरु किया फेरि कर, मन का औरै रूप ।*
*दादू पंचों पलटि कर, कैसे भये अनूप ॥*
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२- रामदासजी रामदासजी अजमेर से जो केवलरामजी की शरण कायस्थ सज्जन आये थे वे ही केवलरामजी के शिष्य हो गये थे । तब उनका ही नाम रामदासजी रखा था और वे ही केवलरामजी की गद्दी पर विराजे थे ।
७ वें महन्त भगवान् दास जी जोधपुर के अस्थल से आकर गादी पर विराजे थे । ये बड़े प्रारब्धी संत थे ।
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८ वें सूरतरामजी विद्वान् और कवि हुये हैं ।
९वें रामनारायणजी १४ विद्याओं के ज्ञाता थे । उस समय उनके समान कोई अन्य विद्वान् ज्ञात नहीं होता था । कहा भी है~
"पंडित चबदा विद्या निधाना, रामनारायण सदृश न आना ।" आप अच्छे संगीतज्ञ थे । आपका पत्र व्यवहार पंडित निश्चलदासजी महाराज से भी होता रहता था ।
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१० गोविन्ददासजी अच्छे श्रीमान् हुये हैं ।
११ वें बोलतारामजी ख्याती प्राप्त हुये हैं । ये महाराज ध्यानदासजी के शिष्य थे । जाति के क्षत्रिय थे । शिकार करते समय एक बार एक गर्भवती हिरणी के इन्होंने गोली मारी थी । उससे गर्भ का बच्चा और हिरणी दोनों मर गये थे । उससे इनको अति ग्लानि हो गई फिर ये साधु हो गये ।
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वि सं. १९२५ में २५ वर्ष की आयु में साधु हुये थे । परबतसर के पास श्यामपुरा ग्राम के थे । साधु भेष लेने के पश्चात् १५ वर्ष तक तपस्वी रहे । साधु होने के पश्चात् किसी साधु के कुछ कहने पर आपने अपनी मूत्रेन्द्रिय काट दी थी । आपने प्रति दिन सवा लाख जप बहुत समय तक किया था । सुनते हैं आपने चार निस्संतान व्यक्तियों को संतानें दी थीं ।
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महन्त जुगलदासजी के प्राण कई दिन से नहीं निकल रहे थे, वे बहुत कष्ट पा रहे थे । आपने दादूवाणी के अचले का एक कौणा पानी में धोकर उनको पिलाया फिर उनका अनायास देहान्त हो गया था । आपकी कोटा, संगरूर, जयपुर आदि राजघरानों में अति प्रतिष्ठा थी । आप समाधि सिद्ध योगी थे ।
कहा भी है~
"पाछे भये बोलता रामा, ताका प्रसिद्ध जग में नामा ।
योगी भये समाधि लगाई, ताकी कीर्ती जग में छाई ॥"
इनकी गादी पर बैठने वाले महन्त चेतनजी ने उक्त पद्य अपने रचित दादू चरित्र के अन्त में लिखा है । वि.सं. १९७३ में मगसिर सुदि १३ को ब्रह्मलीन हुये । आपकी समाधि बीलू ग्राम में है ।
(क्रमशः)

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