शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२१. भजन भेद का अंग ~१/४*
इस अंग में भगवद्-भजन संबन्धी रहस्य का विचार कर रहे हैं ~
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*सब करणी साधन किये, त्यागी शूर सुजान ।*
*जो रज्जब राम हिं भजे, मन मनसा घर आन ॥१॥*
जो साधक शूर विषयाशा को त्याग कर तथा मन और बुद्धि अपने स्थान में स्थिर करके राम को भजता है, उसने सभी कर्तव्य पालन और सभी साधन कर लिये अर्थात भजन से साधक के सभी काम हो जाते हैं ।
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*जन रज्जब जंजाल तज, मन मनसा कर ठाँम ।*
*करने को कहु क्या रह्या, यूं लागा जब नाम ॥२॥*
जग-जाल को तजकर तथा मन बुद्धि को अपने आदि परमात्मा के स्वरूप में लीन करके नाम चिन्तन में लगा है, तब कहो ? क्या करना शेष रहा ।
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*रज्जब राखो नाम में, पंच पचीसौं मन्न ।*
*सब समेट सुमिरन करे, सोई साधू जन्न ॥३॥*
पंच ज्ञानेन्द्रियाँ, पच्चीस प्रकृतियाँ और मन को नाम में लगाये रक्खो, उक्त प्रकार सबको नाम में एकत्र करके सुमिरन करता है वही जन साधु है ।
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*रज्जब सुमिरे राम को, रोक दशों दिशि द्वार ।*
*नख शिख राखे नाम में, यों ही पैला१ पार ॥४॥*
अनुचित विषयों की और जाने के दश इन्द्रिय रूप दश द्वारों को रोककर नख से शिख पर्यंत शरीर का नाम परायण रखना चाहिये, ऐसा करने से ही संसार के पर१ पार जाकर प्रभु से मिलना होता है ।
(क्रमशः)

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